रायपुर । बस्तर में एक ईसाई व्यक्ति को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने का विरोध हो रहा है। इस वजह से उनके बेटे रमेश बघेल, जो अनुसूचित जाति के किसान हैं, को 12 दिनों से शव को मोर्चरी में रखना पड़ रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रमेश बघेल ने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन 9 जनवरी को फैसला उनके पक्ष में नहीं आया। अब सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
रमेश बघेल के पिता सुभाष, जो एक पादरी थे, का 7 जनवरी को बीमारी के चलते निधन हो गया। रमेश के दादा ने तीन दशक पहले ईसाई धर्म अपना लिया था। उनके दादा सहित दो रिश्तेदारों को छिंदवाड़ा गांव के कब्रिस्तान में दफनाया गया था। इस आदिवासी बहुल गांव के कई अन्य लोगों ने भी ईसाई धर्म अपनाया है। रमेश बघेल चाहते हैं कि उनके पिता की अंतिम इच्छा पूरी हो और उन्हें उनके परिवार के सदस्यों के बगल में दफनाया जाए।दो साल पहले तक सबकुछ ठीक था। फिर एक मजबूत राजनीतिक दल के कुछ ग्रामीणों ने ईसाइयों का सामाजिक बहिष्कार करने के लिए लोगों को उकसाना शुरू कर दिया। उन्होंने धर्म परिवर्तन के कारण ईसाइयों को गांव के कब्रिस्तान में शव दफनाने से रोकने की बात कही। उन्होंने कम से कम एक और ईसाई परिवार को कब्रिस्तान में शव दफनाने से रोका था। रमेश ने पुलिस से शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कथित तौर पर ग्रामीणों का पक्ष लिया। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।


