पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश को भी जल का मुद्दा पड़ सकता भारी
नई दिल्ली । पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश को भी जल का मुद्दा भारी पड़ सकता है। इस साल के आखिर में पूरी हो रही फरक्का जल संधि को भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ा सकता है। दरअसल, भारत की नीति पड़ोसी देशों के साथ समन्वय की रही है, लेकिन कई देशों की राजनीति ने अक्सर भारत के लिए दिक्कतें खड़ी की हैं। इनमें बांग्लादेश भी शामिल है, जिसने कई मुद्दों पर टकराव की स्थिति पैदा की है।
बता दें ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता स्थगित कर दिया था। इसके बाद से पाक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुहार लगा रहा है। वहीं, अब बांग्लादेश का भारत के प्रति रुख रक्षात्मक है। इसकी वजह फरक्का जल संधि है। गंगा पर भारत, बांग्लादेश के बीच यह संधि बेहद खास है। संधि पर 12 दिसंबर 1996 को हस्ताक्षर हुए थे, जो एक जनवरी से 31 मई के दौरान फरक्का बैराज से गंगाजल का वितरण तय करती है। यह संधि दिसंबर 2026 में खत्म हो रही है। अब भारत पर निर्भर है कि वह इसे कैसे आगे बढ़ाएगा, क्योंकि बिहार में इस संधि का विरोध हो रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार सरकार और बीजेपी की सहयोगी जेडीयू का तर्क है कि फरक्का बैराज की वजह से गंगा में गाद जमा हो गई है, जिससे नदी का तल ऊंचा हो गया है। इससे मानसून में बिहार में बाढ़ का खतरा रहता है। गर्मियों में जलस्तर घटने से जल की कमी का सामना करना पड़ता है। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का कहना है कि संधि खत्म होने के बाद बिहार समेत गंगा बेसिन के राज्यों की 2050 तक की जल की जरूरतों का आकलन कर नई व्यवस्था बनाई जाए। संसद के मानसून सत्र में यह मुद्दा उठा था। तब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि सरकार बिहार की जरूरतों-चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सही फैसला लेगी।
जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि पूर्व सीएम नीतीश कुमार पिछले कई सालों से गाद प्रबंधन, फरक्का बराज, गंगा की अविरलता और बिहार के जल अधिकारों का मुद्दा उठाते रहे हैं। वहीं संजय कुमार झा की ओर से हाल में राज्यसभा में फरक्का जल संधि के नवीनीकरण के विरोध में दिए गए बयान के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार गंगा में गाद के जमाव को बिहार में बाढ़ की गंभीर समस्या के प्रमुख कारणों में एक मानते रहे हैं। गाद के कारण नदी की जलधारण क्षमता और प्रवाह की गहराई घटती है, जिससे अधिक पानी आने पर नदी के आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। गाद प्रबंधन की समस्या का समाधान किए बिना नमामि गंगे जैसी योजनाओं का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता।


