अनीता मुर्मू के साथ एक महिला दिवस पर विशेष संवाद
एस. के. झा ‘सुमन’
दुमका । कहते हैं कि जिनके पास खोने को कुछ नहीं होता, उनकी आंखों में पूरा आसमान जीतने के ख्वाब होते हैं। दुमका के जामा प्रखंड स्थित सुखवाड़ी गांव की अनीता मुर्मू आज इसी हौसले का दूसरा नाम बन चुकी हैं। कल तक जो हाथ मुफलिसी के कारण हड़िया-शराब बेचने को मजबूर थे, आज वही हाथ कंप्यूटर के की-बोर्ड पर आत्मनिर्भर भारत की नई इबारत लिख रहे हैं।
एक वक्त था जब अनीता पाई-पाई को मोहताज थीं। लेकिन उन्होंने हालातों से हार मानने के बजाय संघर्ष को चुना। महज 12 महिलाओं के साथ शुरू हुआ उनका ‘सखी मंडल’ का छोटा सा कारवां आज एक विशाल आत्मनिर्भर अभियान का रूप ले चुका है। गांव में अभी 6 सखी मंडल सक्रिय हैं। उन्होंने बताया कि अभी दीदी की दुकान, ग्राहक सेवा केंद्र, नवजीवन सखी सहित कई अन्य में एक्टिव वूमेन के रूप में काम कर रही हैं। ‘संताल एक्सप्रेस’ के ब्यूरो प्रभारी एस. के. झा ‘सुमन’ के साथ एक विशेष बातचीत में अनीता ने बताया कि कैसे एक दृढ़ संकल्प ने हजारों महिलाओं के हाथों में स्वावलंबन की चाबी थमा दी है।
—————–
सवाल : एक साधारण गृहणी से ‘सोशल लीडर’ बनने तक का आपका सफर कैसा रहा?
अनीता मुर्मू : जीवन संघर्षों से भरा रहा। नवजीवन सखी, सखी मंडल, ग्राहक सेवा केंद्र और दीदी की दुकान से जुड़ने के बाद उन्होंने खुद को बदला और अन्य महिलाओं को भी संगठित किया, जिससे आज उन्हें समाज में सम्मान मिला।
सवाल : आर्थिक आजादी महिलाओं के आत्मविश्वास को कैसे बदलती है?
अनीता मुर्मू : जब महिलाओं के पास अपनी कमाई होती है, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे घर-परिवार के फैसलों में भी भागीदारी करने लगती हैं।
सवाल : आपने समाज में क्या बदलाव देखे? जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पातीं, उन्हें आप क्या संदेश देंगी?
अनीता मुर्मू : अब गांव की महिलाएं जागरूक हो रही हैं। उनका संदेश है कि महिलाएं डर छोड़कर घर से बाहर निकलें, हुनर सीखें और स्वरोजगार से जुड़कर अपना भविष्य बदलें।


