– अशोक सिंह
झारखण्ड की प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा न सिर्फ एक बड़ी पार्टी है बल्कि राज्य और केन्द्रीय सत्ता में बड़ा हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य भी रखती है। दिसोम गुरू शिबू सोरेन उसके सुप्रीमो हैं और आदिवासियों के मसीहा, जिनके नाम पर जेएमएम अपनी सत्ता का खेल झारखण्ड की राजनीति में लम्बे समय से खेलता रहा है।
अभी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अपनी स्थापना का 46वाँ वर्षगाँठ मना रहा है। 2 फरवरी दुमका गाँधी मैदान में आदिवासियों का महाजुटान, जेएमएम का एक बड़ा राजनीतिक उत्सव और आदिवासी राजनीतिक चेतना का केन्द्र भी। जहाँ आज भी बड़ी संख्या में आदिवासियों का एक वर्ग अपने दिसोम गुरू शिबू सोरेन को देखने-सुनने आता है। जी हाँ वही शिबू सोरेन जिसे आज भी आदिवासी समाज न सिर्फ अपना मसीहा मानता है बल्कि उन्हें भगवान की तरह पूजता भी है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शिबू सोरेन झारखण्ड राज्य आन्दोलन की अगुवाई करने वालों में एक प्रमुख आन्दोलनकारी रहे हैं और उन्होनें इसके लिए बड़ा संघर्ष खड़ा किया। उस संघर्ष में आदिवासी मूलवासी सदानों ने भी सामूहिक संघर्ष किया। उन्हीं संघर्षों ने शिबू सोरेन को लोकप्रिय जननेता बनाया। वे चाहते तो झारखण्ड के गाँधी बन सकते थे लेकिन अफसोस कि गाँधी तो दूर वे एक आधे-अधूरे राजनीति संत बनकर रह गये, जिनकी अपनी एक अलग ही संघर्ष कथा है।
शिबू सोरेन की कहानी उस घटना से जुड़ी है, जब 1957 में महाजनों ने सोबरन मांझी की हत्या करवा दी थी। सोबरन मांझी नेमरा गाँव के स्कूल में पढ़ाते थे। पड़ोस के गाँव हेडबरगा के महाजनों से उनका झगड़ा चल रहा था। झगड़ा इसलिए था क्योंकि हेडबरगा के साव परिवार के लोग आदिवासियों को तरह-तरह से ठग कर उनकी जमीन अपने नाम लिखवा रहे थे। ऐसे ही एक मामले में जब गाँव की एक विधवा सूद पर लिया गया पैसा नहीं लौटा पाई तो साव परिवार और उनके गुंडो ने पूरे साल की धान की फसल पर कब्जा करने की कोशिश की। इसे देखकर सोबरन मांझी से रहा नहीं गया और उन्होंने साव की पिटाई कर दी। बाद में एक और महिला को डायन बताकर जब उसकी हत्या करा दी गई और उसकी जमीन पर कब्जे की कोशिश हुई तो भी विरोध के कारण सोबरन मांझी साव लोगों की आँखों में खटकने लगे और एक दिन सुबह जब वे पास के कस्बे में पढ़ रहे अपने बेटों को चावल पहुँचाने जा रहे थे, तो गंुडो ने फरसे से हमला कर उन्हें मार डाला। उनकी लाश दामोदर की सहायक नदी भेड़ा के तट कर मिली थी। सोबरन मांझी अपने जिन दो बेटों के लिए चावल पहुँचाने जा रहे थे, उनमें से एक नाम शिबू था। वही शिबू अभी के वे शिबू सोरेन हैं,
शिबू सोरेन को आज वहाँ से देखने की जरूरत है जहाँ से उन्हें मौजूदा देश काल की मुख्यधारा देखने को तैयार नहीं है। ऐसे में आज शिबू सोरेन का मूल्यांकन नये सिरे से करने की जरूरत है लेकिन साथ ही यह संतुलन भी बरतना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जिये हुए कालखण्ड के एक हिस्से भर से तय नहीं होता और बुरे कर्म का बुरा होना उन मानदंडों पर निर्भर करता है, जिनपर उसे कसा जा रहा है। शिबु सोरेन, सोबरन मांझी के बेटे शिबु सोरेन जो उस संथाल जाति के हैं जो झारखण्ड सहित भारत के तमाम हिस्सों में अब हाशिये पर धकेल दिये गये हैं और जहाँ से वे आज तक आदिवासी उत्पादन की मध्यकालीन प्रणाली तक भी नहीं पहुँच सके। शिबू सोरेन जिस आदिवासी समुदाय से आते है वहाँ निजी सम्पति को लेकर अलग नजरिया रहा है। नई उत्पादन की व्यवस्था की घुसपैठ आदिवासियों के बीच जहाँ नहीं हो पायी है, वहाँ अब भी सम्पति के संग्रह की प्रवृति कमजोर है। यही कारण है के आदिवासी समुदाय में आज कहीं कोई जमीनदार नहीं मिलेंगे और न ही उनमें छोटे बड़े का वह जन्मना बँटवारा ही है, जो हिन्दू समाज की अन्तर्वस्तु है।
सोबरन मांझी के हत्या के बाद शिबू सोरेन की पढ़ाई अधूरी रह जाती है। गाँव के आस-पास उन्हें आदिवासियों के शोषण का वही तंत्र दिखता है, जिसके खिलाफ उनके पिता ने आवाज उठाने की हिम्मत की थी और जिसकी कीमत जान देकर चुकायी थी। जिस जमीन को सोबरन मांझी साव लोगों के कब्जे से बचाना चाहते थे, उस जमीन पर साव के लठैतों का कब्जा था। शिबू सोरेन ने इस जमीन से वह आंदोलन शुरू किया जिसकी गूंज लगभग दो दशक तक झारखण्ड में सुनाई देती रही। वह था धनकटनी आंदोलन। शिबू सोरेन ने गांव की महिलाओं और पुरूषों को एक जुटकर एक रात में उस जमीन पर खड़ी धान की फसल कटवा दी। जल्द ही ये आंदोलन आसपास के जिलों में फैल गया। निशाने पर वे जमीनें थीं जिन्हंे आदिवासियों से हड़प लिया गया था। इस आंदोलन के शिकार बने झरखण्ड के सदान यानी गैर-आदिवासी मूलवासी। इस आंदोलन की गर्मी में खून-खराबा भी हुआ लेकिन आदिवासियों ने उसे न्याय के लिए हुई लड़ाई का हिस्सा माना। उस समय का शिबू पुलिस की पहुँच से दूर गाँव जंगलों के साथ एकाकार होकर आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ रहा था। कई जिलों की पुलिस उसे ढूंढती थी लेकिन झारखण्ड के जंगल और वहाँ के लोगों ने शिबू सोरेन को उसी तरह छिपा लिया जैसे माँ अपने बच्चे को आँचल में ढक लेती है।
हजारीबाग जिले के बाद शिबू सोरेन का दूसरा कार्यक्षेत्र धनबाद जिले का टुंडी ब्लॉक बना। यहाँ भी आदिवासियों के शोषण की वही कहानी थी। यहाँ भी शिबू सोरेन जल्द ही जम गये और उनका वह धनकटनी आंदोलन टुंडी में भी चल पड़ा। साथ ही सरकारी जमीन और तालाबों पर गैर आदिवासियों के कब्जे के खिलाफ भी उन्होंने अंादोलन चलाया जिसमें काफी जमीन आदिवासियों के हाथ में वापस आ गई। टुंडी में शिबू सोरेन ने अपने आंदोलन के साथ-साथ कई रचनात्मक कार्यों पर भी काफी जोर दिया। शिबू सोरेन अपने अनुभवों से जानते थे कि आदिवासियों के पिछड़ेपन की मुख्य वजह उनकी अशिक्षा, सुद पर पैसे लेने की मजबूरी और शराब की लत है। टुंडी में शिबु सोरेन ने जंगल के अंदर आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल खोले और खुद भी उन स्कूलों में पढ़ाया। यह आंदोलन झारखण्ड में अखिल अखाड़ा के नाम से मशहूर हुआ। उन्होंने आदिवासियों से कहा कि भूख लगे तो पड़ोसियों से मांग लो पर सूद पर महाजनों से कर्ज मत लो। साथ ही उन्होने यह भी कहा कि अब पुराने कर्ज को लौटाने की जरूरत नहीं है। इसके अलावे नशाखोरी पर भी शिबू ने अपने लोगों को चेताया। उस समय उनके अनुयायी इसका पालन करते थे साथ ही उसपर सख्ती से अमल भी होता था। इसके लिए शिबू सोरेन ने उन दिनांे मटका फोड़ो आंदोलन भी चलाया।
अपने इन्ही सब क्रांतिकारी और जुझारू गतिविधियों के कारण उनदिनों शिबू इतना खतरनाक माने जाते थे कि पुलिस को उन्हें देखते ही गोली मार देने का आदेश दिया गया था। लेकिन उनदिनों शिबू के पक्ष में स्थिति ऐसी थी कि पुलिस की गोली भी शिबू के सीने से टकराकर वापस लौट जाती थी।
यह सच है कि महाजनी प्रथा और आदिवासियों पर जमीदारी जुल्म-शोषण के खिलाफ बागी तेवर में आंदोलन चलाने वाले शिबू सोरेन एक लम्बे जन आंदोलन के गर्भ से निकले देशज आदिवासी नेतृत्व के प्रतीक हैं लेकिन सन् 1980 में अंदोलन की अपनी ही तैयार जमीन को छोड़कर जब वे दुमका से संसद का चुनाव जीतकर संसदीय राजनीति में जाते हैं तो वहाँ सत्ता के गलियारे में उनकी मानसिकता ही बदल जाती है। यह भी जानीमानी बात है कि उन्होंने झारखण्ड आंदोलन को मिशन द्वार पर ठिठके आदिवासी आंदोलन के घेरे से बाहर निकाल कर क्षेत्रीय आबादी के सभी घटकों के बीच स्वीकार बनाने में 20 सालों तक अनथक परिश्रम किया। इस कारण निःसंदेह उनके राजनीतिक जीवन का पूर्वाद्ध क्षेत्रीय इतिहास का एक गौरवशाली इतिहास है। लेकिन मात्र इसके आधार पर ही उन्हें झारखण्ड का भाग्य विधाता और आदिवासियों का मसीहा मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। क्योंकि इसके बाद की उनकी तमाम गतिविधियाँ, चाहे सत्ता पाने के लिए किसी भी पार्टी या संगठन से किसी भी शर्त पर समझौता या फिर परिवारवाद के मोहजाल में फँसकर धृतराष्ट्री मुद्रा अपनाना या फिर निजी स्वार्थ के लिए विदेशी कम्पनियों व पूँजीपतियों से सौदा करना जैसे वे तमाम क्रियाकलाप उन्हें पतन के एक ऐसे रास्ते पर ले जाता है, जहाँ से वे झारखण्ड के एक सर्वमान्य आदिवासी जन नेता बनते-बनते रह जाते हैं और इस तरह उनकी महान यात्रा एक मुकाम के बाद उनकी ही कमियों-खामियों की वजह से एक विराट विपरीत महायात्रा में बदल जाती है।
शिबू सोरेन के उन ऐतिहासिक आंदोलनों के संदर्भ में कहें तो यहाँ सबसे महत्वपूर्ण और गौरतलब बात यह है कि झारखण्ड मेें ऐसे आंदोलन आज भी चल रहे हैं लेकिन यह आंदोलन शिबू सोरेन का नहीं, बल्कि नक्सलवादी चला रहे हैं। राज्य के एक बड़े हिस्से में उन्हें जनता का साथ भी हासिल है। दूसरा पहलू यह है कि जो शिबू इस लड़ाई में आदिवासियों और मजलूमों के नायक हो सकते थे लेकिन वे न सिर्फ आज इस संघर्ष से गायब हैं, बल्कि उनकी और उनकी पार्टी इस संघर्ष मंे शोषित जनता के विरूद्ध राज्यसत्ता के सहयोगी की भूमिका में है। ऐसे में आज यह सवाल उठाना जरूरी लगता है कि जो शिबू सोरेन अपने समय में देश में आदिवासियों के सबसे बड़े नेता रहे और जिनका प्रभाव वर्तमान झारखण्ड के अलावा उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाको में भी रहा, उसकी भूमिका कब और कैसे बदल गई?
उनके जीवन का इतिहास बताता है कि गांव और जंगल में आंदोलन चलाने वाले शिबू सोरेन का समय-समय पर वामपंथी कार्यकर्ताओं से संबंध रहा। नक्सलियों के साथ उनका नाता तो कभी नहीं रहा लेकिन सीपीआई और सीपीएम से अलग हुये मार्क्सवादी को-ऑर्डिनेशन कमिटि के साथ वे लगातार उठते बैठते रहे। सीपीआई के मंजूर हुसैन से लेकर एके राय तक से उन्होंने राजनीति सीखी लेकिन शिबू सोरेन कभी वामपंथी नहीं रहे। एके राय की प्रेरणा से जब विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन को केन्द्र में रखकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ। कुर्मी जाति के विनोद बाबू झामुुमो के पहले अध्यक्ष बने और शिबू सोरेन महासचिव। झारखण्ड में आदिवासी-सदान एकता की यह सबसे बड़ी कोशिश थी। लेकिन यह दोस्ती विनोद बाबू की मौत के बाद चल नहीं सकी। शिबू सोरेन भी एके राय से हाथ छुड़ाकर जल्द के काँग्रेस के प्रभाव में चले गये। इसके लिए दोषी सिर्फ शिबू सोरेन रहे होंगे, यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा। संयुक्त मोर्चा के रणनीति के तहत एके राय चाहते थे कि वह झारखण्ड की उत्पीड़ित जनता के बीच पुल का काम करे। उनकी यह भी राय थी कि झामुमों पार्टी की तरह काम न करें, बल्कि पार्टी की भूमिका में मार्क्सवादी को-ऑर्डिनेशन ही रहे और चुनाव एमसीसी के नाम से ही लड़ा जाय। साथ ही एके राय चाहते थे कि इस आंदोलन का नेतृत्व मजदूरों के हाथ में रहे। लेकिन झारखण्ड की खास स्थिति में मजदूरों के अधिनायकत्व के सिद्धांत की सीमाएँ थी।
झारखण्ड के उद्योगीकरण की खासियत है कि यहाँ के उद्योगों में काम करने वाले स्थायी मजदूरों में झारखण्ड के मूल निवासियों की संख्या काफी कम है। शुरूआती दौर से ही झारखण्ड के उद्योगपतियों और उनके अफसरों, यहाँ तक की सरकारी अधिकारियों ने भी स्थायी मजदूरों की नियुक्ति में बाहर से आये लोगों को तरजीह दी। साथ ही झारखण्ड के मूल निवासियों ने भी शुरूआती दौर मंें कारखानों में काम करने के प्रति कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। बाद में जब उद्योगीकरण की रफतार तेज हुई और जंगल पर निर्भर रह कर जीवन चलाना मुश्किल होता चला गया तो आदिवासियों ने खदानों और कारखानोें में काम ढूढ़ने की कोशिश की। लेकिन उनके जिम्मे ज्यादातर असंगठित काम ही आया। बाहर से आये मजदूरों और झारखण्ड के मूल निवासियों में भी हितों का ठकराव है और उनके बीच कई बार शोषक और शोषित का संबंध बन जाता है। झारखण्ड के औद्योगिक क्षेत्रा में ज्यादातर अफसर, ठेकेदार , सुदखोर, रंगदार और गुण्डे झारखण्ड के बाहर से आये हुये समुदायों से हैं और इनका झारखण्ड के मूल निवासियों के साथ सीधा टकराव है। इस टकराव को मजदूर और मूल निवासियों की एकता के सरलीकृत नारो से पाट पाना आसान नहीं था। इसलिए एके राय की लाल और हरे झंडे की एकता की कोशिशें आखिरकार विफल हो गयीं। इन पेचीदगियों में शिबू सोरेन के पास अपने लिये सकारात्मक रास्ता चुनने का विकल्प था या नहीं, यह कहना कठिन है। शिबू सोरेन ऐसा करना चाहते भी थे या नहीं इसका जवाब देना भी आसान नहीं। लेकिन समय प्रवाह में सब ने शिबू सोरेन को वह रास्ता अपनाते देखा जो पतन का रास्ता था। इन सब के बीच झामुुमो की राजनीतिक सत्ता बेशक खत्म नहीं हुई, लेकिन झारखण्ड में परिर्वतनकामी शक्ति के रूप में इसकी भूमिका खत्म हो गई।
झारखण्ड की आबादी की तेजी से बदलती संरचना और कुल आबादी में झारखण्ड के मूल निवासियों की घटती संख्या के कारण झारखण्ड आंदोलन का वह पुराना रूप लौट कर नहीं आ सकता। इतिहास ने शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो के सामने एक महान जिम्मेदारी रखी थी। विनोद बाबू के मूल्यांकन के समय कोई कह सकता है कि असमय निधन के कारण उनका सर्वश्रेष्ठ हम देख नहीं पाये लेकिन शिबू सोरेन के साथ इतिहास शायद ही ऐसी कोई रियायत करे।
एक ऐसे समय में जब झारखण्ड सहित देश की राजनीति की मुख्यधारा में खुद को शिद्दत से स्थापित कर चुके शिबू सोरेन अपनी उपस्थिति और भागीदारी को सत्ता के लिए अनिवार्य और निर्णायक बना चुके हैं, उनके बारे में यह बात पूरी बेबाक ढंग से जोर देकर कही जा सकती है कि झारखण्ड में शोषण के खिलाफ लड़ाई न तो शिबू सोरेन के साथ शुरू हुई थी और न ही उनके पतन और सत्ता में रहने न रहने से खत्म हो जायेगी। शोषण के खिलाफ लड़ाई की परम्परा में अलग-अलग समय में बिरसा मुण्डा और सिद्धो कान्हू जैसे कई नाम सामने आये हैं और आगे भी आते रहेंगे। आंतरिक उपनिवेशवाद के खिलाफ झारखण्ड में लड़ाई अभी भी जारी है। कहीं यह मावोवादियों के संघर्ष के रूप में सामने आता है, तो कहीं जल,जंगल, जमीन की रक्षा और विस्थापन के विरूद्ध चल रहे बेहद लम्बे और थका देने वाले संघर्ष मंे जुड़े विभिन्न जन संगठनों के जुझारू और क्रांतिकारी साथियों की गतिविधियों में और कहीं ट्रेड युनियन आंदोलनों में। हाँ, यह सच है कि आज इन संघर्षों की दिशा अलग-अलग है। साथ ही यह भी कि उनकी अपनी ताकत है तो कमजोरियाँ भी कम नहीं हैं। लेकिन उससे बड़ा सच यह भी है कि इन सबके बावजूद आज इन संघर्षों के बीच से कई नये नायक भी सामने आ रहे हैं। ये नायक झारखण्ड को कहाँ और किस दिशा में ले जायेगें, उनका इतिहास क्या होगा यह कह पाना कठिन है। लेकिन यह बात भी आज लगभग पूरी तरह सिद्ध हो चुकी है कि शिबू सोरेन चाहे सत्ता में रहे या विपक्ष में झारखण्ड की तस्वीर और तकदीर उनसे नहीं बदलने वाली है क्योंकि झारखण्ड की राजनीति में वो लोकप्रिय तो हैं किन्तु सर्वमान्य नहीं।
जनमत शोध संस्थान पुराना दुमका केवटपाड़ा दुमका-814101 ( झारखण्ड ) मो. – 9110072128


