कर्ज लेने में मध्य प्रदेश सरकार ने बनाया रिकॉर्ड
नई दिल्ली । पिछले कुछ वर्षों से राज्य सरकारों में कर्ज लेने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी के साथ बढ़ती चली जा रही है। राज्य सरकारों पर कर्ज लगातार बढ़ रहा है। राज्य सरकारों पर यह कर्ज तब बढ़ रहा है, जब राज्य सरकारों को टैक्स से हर साल ज्यादा कमाई हुईं है।
राज्य सरकारें अगले 3 महीने में 4.73 लाख करोड़ का कर्ज बाजार से लेने वाली हैं। वित्त वर्ष 2024-25 के अप्रैल से नवंबर तक राज्य सरकारों ने 3.46 लाख करोड रुपए का कर्ज लिया है। जनवरी से मार्च 2025 तक 4.73 लाख करोड रुपए कर्ज लेने जा रहे हैं। इस हिसाब से राज्यों के ऊपर पूरे साल की कुल उधारी 9.20 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है।
पिछले वर्षों में राज्य सरकारों ने जो कर्ज लिया था। वर्ष 2024-25 में पिछले वर्ष की तुलना में यह 28.57 फ़ीसदी ज़्यादा होगा। कोरोना काल में राज्य सरकारों ने 6.31 लाख करोड़ का कर्ज लिया था। उस रिकॉर्ड को राज्य सरकारों ने इस साल तोड़ दिया है।
कर्नाटक सरकार 3 माह में सबसे ज्यादा 48000 करोड रुपए बाजार से कर्ज उठाने जा रहा है। तेलंगाना सरकार 30000 करोड रुपए का कर्ज जुटाएगी। तमिलनाडु सरकार भी लगभग 45000 करोड रुपए कर्ज के रूप में लेने की तैयारी कर रही है। मध्य प्रदेश सरकार भी 45000 करोड रुपए का ऋण वर्ष 2024-25 में लेने जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार 36000 करोड़,राजस्थान 23707 करोड़, गुजरात 16000 करोड़, महाराष्ट्र 50000 करोड़,बिहार 15546 करोड़,हरियाणा 23500 करोड़, हिमाचल प्रदेश 2000 करोड़ तथा छत्तीसगढ़ सरकार 7000 करोड रुपए का ऋण लेने जा रही है।
पंजाब में जीडीपी का 44 फ़ीसदी कर्ज
कई राज्य अपनी जीडीपी की तुलना से ज्यादा कर्ज ले रहे हैं। इसमें पंजाब सरकार सबसे आगे है। उसका कर्ज 44.1 फ़ीसदी पर पहुंच गया है। हिमाचल का 42.5 फ़ीसदी,अरुणाचल का 40.1 फ़ीसदी, नागालैंड का 38.6 फ़ीसदी, मेघालय का 37.6 फ़ीसदी, पश्चिम बंगाल का 36.9 फ़ीसदी, राजस्थान का 36 फ़ीसदी,बिहार का 35.7 फ़ीसदी, मणिपुर का 34.5 फ़ीसदी, त्रिपुरा का 34.5 फ़ीसदी, सिक्किम का 34 फ़ीसदी, उत्तर प्रदेश का 32.7 फ़ीसदी तथा मध्य प्रदेश का 32 फ़ीसदी कर्ज होगा। जो राज्यों की आर्थिक स्थिति को दर्शा रहा है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव मे फ्री की रेवड़ी
दिल्ली विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में फ्री स्कीम की झड़ी लगा दी है। सारे राजनीतिक दल एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। राज्यों की अर्थव्यवस्था में इस तरह की योजनाओं से राज्य के विकास कार्यों में इसका असर देखने को मिल रहा है। राज्य सरकारें कर्ज लेकर फ्री में रेवड़ी बांट रहे हैं। राज्यों का कर्ज और टैक्स की वसूली का अधिकांश पैसा फ्री में जा रहा है। जिसके कारण राज्यों की अर्थव्यवस्था दिनों दिन खराब हो रही है। शिक्षा स्वास्थ्य और अन्य जरूरी कामों के लिए सरकार के पास बजट में पैसा नहीं है। इससे एक बडा असंतुलन पैदा हो रहा है।


