ब्यूरो
दुमका : जिले के गोपीकांदर प्रखंड स्थित खड़ीबाड़ी गांव के पहाड़िया टोला में गहराते पेयजल संकट की गूंज अब शासन-प्रशासन के गलियारों तक पहुंच गई है। पिछले एक-दो साल से बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे लगभग 50 आदिम जनजाति परिवारों की सुध लेते हुए राज्य के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने जिला प्रशासन को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
———–
खराब चापाकल और हाथी के दांत साबित होती जल मीनारें
ग्रामीणों का जीवन दूषित पानी और पथरीले रास्तों के बीच सिमट कर रह गया है। गांव में लगे पांचों चापाकल लंबे समय से ठप हैं। सोलर जल टंकियों का हाल भी बुरा है; एक पूरी तरह बंद है तो दूसरी जवाब दे चुकी है। आलम यह है कि महिलाओं और बच्चों को जंगली रास्तों से होकर करीब एक किलोमीटर दूर स्थित झरनों और कुओं से पानी ढोना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि गंदा पानी पीने से सर्दी-खांसी जैसी बीमारियां घर कर रही हैं।
———–
प्रशासनिक सुस्ती और मंत्री का कड़ा रुख
हैरानी की बात यह है कि ग्रामीणों ने दो महीने पहले ही प्रखंड कार्यालय में गुहार लगाई थी। मिस्त्री आए जरूर, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। यहां तक कि आंगनबाड़ी केंद्र में साल भर पहले लगी पाइपलाइन से आज तक पानी की एक बूंद नहीं टपकी। सोशल मीडिया पर मामला वायरल होने के बाद मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने ‘X’ के माध्यम से संज्ञान लिया और दुमका प्रशासन को प्राथमिकता के आधार पर चापाकलों की मरम्मत कराने और स्वच्छ पानी सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।
अब ग्रामीणों की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या मंत्री के निर्देश के बाद उनके घरों के सूखे नलों में पानी लौटेगा या उन्हें प्यास बुझाने के लिए फिर उसी खतरनाक जंगली सफर पर निकलना होगा।


