अनीता देवी के साथ एक महिला दिवस पर विशेष संवाद
एस.के. झा. ‘सुमन’
दुमका । सुई की नोक पर बुनी सफलता की इबारत मिलिए दुमका की उस ‘सुपर मॉम’ से, जिसने फटे हालों को सीते हुए बेटी को बनाया असिस्टेंट प्रोफेसर कहते हैं कि अगर हौसला बुलंद हो, तो किस्मत की लकीरें भी रास्ता बदल लेती हैं। दुमका जिले के अंतर्गत आने वाले सरैयाहाट प्रखंड के पंचायत कुर्माहट के गांव कमारचक की अनीता देवी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 2010 में पति के साये के उठ जाने के बाद, जब दुनिया ने सोचा कि अब सब खत्म हो गया, तब इस वीरांगना ने सिलाई मशीन को अपना ‘हथियार’ बनाया। दुमका के शिवपहाड़ चौक मायका को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। छोटे से गुमटी में बिना किसी सरकारी मदद के इंतज़ार के, उन्होंने अपनी सिलाई मशीन को ही अपना हथियार बनाया। जो अनवरत जारी है; बिना किसी सरकारी खैरात की राह ताके, उन्होंने दिन-रात मेहनत की ताकि उनकी बेटी के हाथों में सिलाई की सुई नहीं, बल्कि कलम की ताकत हो। आज उनकी बेटी डॉ. दिव्य पूजा कुमारी संथाल परगना महाविद्यालय में हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर बनकर समाज को नई दिशा दे रही हैं। ‘सुपर मॉम’ से संताल एक्सप्रेस के ब्यूरो प्रभारी एस.के. झा. ‘सुमन’ ने की खास बातचीत।
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सवाल: अनीता जी, 2010 का वह समय आपके लिए पहाड़ जैसा रहा होगा। उस समय क्या सोचा था आपने?
अनीता देवी: सर, जब पति का साथ छूटा तो दुनिया अंधेरी लग रही थी। छोटे बच्चे थे और जिम्मेदारियों का बोझ। लेकिन मैंने तय किया था कि अपने बच्चों को संघर्ष की विरासत नहीं, बल्कि शिक्षा की ताकत दूंगी।
सवाल : सिलाई की मशीन और बच्चों की उच्च शिक्षा… यह तालमेल कैसे बिठाया?
अनीता देवी: मेरी सिलाई मशीन की आवाज ही मेरी ताकत बनी। शिवपहाड़ चौक के निकट छोटे से छोटे से गुगटी पर बैठकर दिन-रात कपड़े सीए ताकि बच्चों की फीस कम न पड़े। आज भी हम मिट्टी के घर में रहते हैं, क्योंकि मेरी प्राथमिकता आलीशान दीवारें नहीं, बच्चों का भविष्य था।
सवाल : बेटी आज कॉलेज में प्रोफेसर हैं, यह उपलब्धि आपके लिए क्या मायने रखती है?
अनीता देवी: जब 2017 में बेटी ने सफलता हासिल की, तो लगा कि मेरे हाथ के छालों को ठंडक मिल गई। अब लक्ष्य मेरा बेटा अनुराग है, जब वह अपने मुकाम पर पहुँच जाएगा, तब मेरा संघर्ष पूर्ण होगा।
सवाल : उन महिलाओं को क्या संदेश देंगी जो मुश्किलों में हार मान लेती हैं?
अनीता देवी: बस यही कि मदद का इंतजार मत कीजिए, अपने हुनर को अपनी पहचान बनाइए।


