राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड अलग राज्य का आंदोलन करनेवाले राजनीतिक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा अपनी स्थापना की 54 वीं वर्षगांठ दो फरवरी को मनायेगा। किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए पांच दशक का लंबा कालंखड उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि है। पांच दशक के कालखंड को पूरी सक्रियता से पूरा कर झामुमो एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में तब्दील हो चुका है। पहले दक्षिण बिहार और आज झारखंड की राजनीतिक में सबसे प्रासंगिक क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रूप में झामुमो का कोई जोड़ नहीं है। आज झारखंड की राजनीतिक झारखंड मुक्ति मोर्चा के ईर्द- गिर्द घूम रही है। राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस उसके सामने संघर्ष करती दिख रही हैं। 81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में 2024 के विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभर चुकी है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी। झामुमो में लगभग पांच दशक तक नेतृत्व करनेवाले शिबू सोरेन ने अपनी मृत्यु के पहले ही पार्टी की बागडोर अपने पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सौंप कर दूरदर्शी निर्णय किया था। आज झारखंड मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व एक युवा और ऊर्जावान नेता के जिम्मे है, जिन्होंने पिछले दो चुनावों में झारखंड समेत पूरे देश को अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दे दिया है। आनेवाले दिनों में झामुमो झारखंड में सबसे बड़ी सियासी चुनौती के रूप में सभी दलों के सामने होगा।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना करनेवाले तीन शख्स में से आज कोई भी जीवित नहीं हैं, लेकिन उनकी ओर से जिस बीज को रोपा गया था, आज धीर-धीरे बढ़कर बरगद का रूप ले चुका है। झामुमो के संस्थापकों में शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो और एके राय ने एक
आनेवाले दिनों में झारखंड में रहनेवाले और बाहर के लोग झारखंड मुक्ति मोर्चा के इतिहास का अध्ययन करेंगे। इतने लंबे सियासी सफर को निरंतर जारी रखने में सफल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस दरम्यान कई उतार-चढ़ाव देखे। पार्टी का नेतृत्व दल के अंदर और बाहर कई झंझावातों को झेलते हुए आज तक यहां पहुंचा। झारखंड में झामुमो की अगुवाई में इंडिया गठबंधन की वर्तमान सरकार चल रही है। जिस राजनीतिक दल को राजकीय और राष्ट्रीय पहचान मिली, उसके अगुआ शिबू सोरेन (उर्फ गुरुजी) हुआ करते थे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना 1972-1973 में शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो और एके राय द्वारा आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन के अधिकार और अलग झारखंड राज्य की मांग के लिए की गई थी। यह पार्टी राज्य में आदिवासी, शोषित और मूलवासियों की आवाज बनकर उभरी। 2000 में झारखंड राज्य के निर्माण में इसका बड़ा योगदान रहा और वर्तमान में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यह एक प्रमुख सत्ताधारी दल है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का संक्षिप्त इतिहास:
स्थापना और उद्देश्य (1972-73): शिबू सोरेन ने 1972 में, और औपचारिक रूप से 1973 में बिनोद बिहारी महतो और एके रॉय के साथ पार्टी बनाई, जिसका प्राथमिक उद्देश्य आदिवासियों को महाजनों के शोषण से मुक्त करना और एक अलग राज्य प्राप्त करना था।
राज्य आंदोलन और संघर्ष:
झामुमो ने ‘झारखंड राज्य’ के लिए कई दशकों तक आंदोलन चलाया। शुरुआत में पार्टी का मुख्य आधार आदिवासी और मूलवासी थे।
चुनाव और गठबंधन: 1980 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर पार्टी ने बिहार विधानसभा में 11 सीटें जीतीं और पहली बार लोकसभा सीट हासिल की। बिहार के दक्षिण भू-भाग (आज का झारखंड) में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को
झारखंड राज्य का गठन: वर्ष 2000 में, झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद झामुमो ने राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बनाई। झामुमो धीरे-धीरे एक मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दल बनता गया।
नेतृत्व और विकास: शिबू सोरेन तीन बार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद, हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पार्टी ने 2013, 2019 और 2024 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में सत्ता हासिल की।
वर्तमान परिदृश्य (2024): 2024 में, हेमंत सोरेन के इस्तीफे के बाद चंपाई सोरेन और फिर से हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो-कांग्रेस-राजद का महागठबंधन झारखंड में शासन कर रहा है।
झामुमो को ग्रामीण, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के बीच गहरी पैठ के लिए जाना जाता है, जो संघर्ष से सत्ता के केंद्र तक पहुँचने वाली एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी है।
वृहद राज्य का आंदोलन
शिबू सोरेन (गुरुजी) के नेतृत्व में पांच दशक से ज्यादा झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अलग राज्य के साथ-साथ वृहद राज्य का आंदोलन किया था। बिहार के साथ-साथ बंगाल, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के कुछ भू-भागों को लेकर वृहद झारखंड राज्य की परिकल्पना के साथ आंदोलन शुरू किया गया था। लेकिन यह वृहद झारखंड का सपना अधूरा ही रह गया। अंतत बिहार को ही दो हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा झारखंड बना दिया गया।
कई साथ बिछड़े
झारखंड मुक्ति मोर्चा की शुरुआत से कई बड़े बड़े नाम वाले नेता इसके साथ जुड़े। लंबा संघर्ष किया। लेकिन धीरे-धीरे वैचारिक मतभेद और भटकाव के कारण कई साथी आधे रास्ते से ही निकल गये। कुछ साथी बिछड़ गये। लेकिन शिबू सोरेन अपनी कारवां को लेकर आगे बढ़ते रहे।
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