अनुज कुमार सिन्हा
दाे फरवरी काे दुमका में झारखंड दिवस और 4 फरवरी काे धनबाद में झारखंड मुक्ति माेरचा का स्थापना दिवस समाराेह हाेगा. झारखंड के इतिहास में इन दाेनाें तिथियाें का बड़ा महत्व है. चार फरवरी 1973 काे धनबाद में झारखंड मुक्ति माेरचा का पहला स्थापना दिवस समाराेह मनाया गया था. यानी झामुमाे 53 साल का हाे चुका है. इस बार भी समाराेह ताे हाेगा, कार्यकर्ताओं-नेताओं में उत्साह भी हाेगा लेकिन एक कमी खलेगी, वह हाेगी दिशाेम गुरु शिबू साेरेन की. यह पहला अवसर हाेगा जब शिबू साेरेन के बगैर समाराेह हाेगा. एक ऐसी कमी, जिसे भरना आसान नहीं है. संताेष इस बात का हाेगा कि जिस झारखंड मुक्ति माेरचा काे शिबू साेरेन ने खड़ा किया था, गांव-गांव से लाखाें कार्यकर्ताओं काे तैयार किया था, वह पार्टी देश की मजबूत क्षेत्रीय पार्टी के ताैर पर स्थापित हाे चुकी है. इसकी अगुवाई काेई और नहीं बल्कि दिशाेम गुरु के पुत्र हेमंत साेरेन कर रहे हैं, जिनके पास विजन है और पार्टी काे आगे ले जाने की पर्याप्त क्षमता है. इसे उन्हाेंने विधानसभा चुनाव में साबित भी किया है. 2019 और 2024 के विधानसभा चुनाव में झामुमाे ने शानदार प्रदर्शन किया और सत्ता में आया. अब झामुमाे अपनी शर्त पर झारखंड में राजनीति करने में सक्षम बन चुका है. शिबू साेरेन ने जाे पार्टी का जाे आधार बना दिया है,अब उसी राह पर, उसी बुनियाद पर झामुमाे आगे बढ़ रहा है.
झारखंड मुक्ति माेरचा की ताकत, उसमें हुए बदलाव काे समझना है, ताे इसके इतिहास काे देखना हाेगा. एक दाैर था जब अलग राज्य की लड़ाई लड़ते वक्त साधन का अभाव था. शिबू साेरेन या पार्टी का संदेश कार्यकर्ताओं या गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए लकड़ी में पत्ता बांध कर या परचा का उपयाेग किया जाता था. झामुमाे के पास हर जिले में अपना व्यवस्थित कार्यालय तक नहीं हाेता था. चुनाव में अपने प्रत्याशियाें के प्रचार के लिए साधन तक नहीं हाेता था. किसी तरह काम चलाया जाता था. आज स्थिति बदल चुकी है और झारखंड मुक्ति माेरचा तकनीक के उपयाेग में किसी राष्ट्रीय पार्टी से पीछे नहीं है. पार्टी के निर्णय, नीतियाें की जानकारी देने के लिए झारखंड मुक्ति माेरचा के पास सक्षम टीम है, जाे साेशल मीडिया, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि का उपयाेग करती है. यह प्राेफेशनल टीम है, जिसके पास हर तरह की जानकारी हाेती है. झामुमाे के सभी नेता-कार्यकर्ता खुद ट्विट करते हैं. देश-दुनिया की किसी भी खबर पर प्रतिक्रिया या अपना पक्ष रखने के लिए झारखंड मुक्ति माेरचा काे समय नहीं लगता. पल-पल की खबर उसे मिलती है. हर डाटा उसके पास उपलब्ध है, हर प्रमुख नेता की प्राेफाइल मीडिया टीम के पास रहती है. कंप्यूटर से निगाह रहती है. इससे निर्णय लेने में आसानी हाेती है. चुनाव के दाैरान झारखंड मुक्ति माेरचा ने प्रचार वाहन काे इतना साधन संपन्न बनाया था कि गांव-गांव तक वीडियाे के माध्यम से पार्टी का संदेश आसानी से पहुंचा था.
झारखंड मुक्ति माेरचा झारखंड में सत्ता में ताे है ही, उसने हाल के वर्षाें में अपना जनाधार बहुत ज्यादा मजबूत कर लिया है. अब इसकी राष्ट्रीय पहचान है. अन्य राज्याें में इसके विस्तार का काम चल रहा है. ऐसे झारखंड के अलावा बिहार, बंगाल, आेड़िशा के कुछ हिस्साें में पहले से झारखंड मुक्ति माेरचा का प्रभाव रहा है. इन राज्याें के चुनाव में झामुमाे प्रत्याशी उतारते रहा है और इसमें सफलता भी मिलती रही है. यह जानना चाहिए कि झारखंड मुक्ति माेरचा तमिलनाडु और पुंडुचेरी तक में चुनाव लड़ चुका है. शिबू साेरेन ने गत वर्ष यानी 2025 में पूरे ताैर पर पार्टी का जिम्मा हेमंत साेरेन काे साैंप दिया था. दाे साल में झारखंड मुक्ति माेरचा काे कल्पना साेरेन के रूप में एक एेसा लीडर मिला है जाे दुनिया बड़े से बड़े मंच पर अपनी बात काे बहुत प्रभावशाली ढंग से रखने में सक्षम है. हाल के वर्षाें में बड़ी-बड़ी बैठकाें में उन्हाेंने पार्टी का प्रतिनिधित्व किया है. इससे हेमंत साेरेन पर भार कम हुआ है. हेमंत साेरेन खुद अध्यक्ष ताे हैं ही, उनके पास विनाेद पांडेय, सुप्रियाे भट्टाचार्य जैसे विश्वासी नेता-कार्यकर्ता हैं जाे पूरी जिम्मेवारी निभा रहे हैं. जाहिर है अब झामुमाे बदल चुका है और आज के दाैर में राजनीति करने के लिए जिस काैशल की जरूरत हाेती है, जिस प्रबंधन की जरूरत हाेती है, उसमें झामुमाे पीछे नहीं है.
झामुमाे की सबसे बड़ी ताकत है संघर्ष करने की उसकी क्षमता, आम आदमी से सीधा संपर्क करने का ताकत. शिबू साेरेन में यह कला थी. उनके भाषण काे सुनने के लिए पचास-पचास किलाेमीटर से लाेग पैदल आते थे, घंटाें इंतजार करते थे. ऐसा इसलिए क्याेंकि वे झारखंड के लाेगाें के नब्ज काे जानते थे. हाल में हेमंत साेरेन के नेतृत्व में ऐसे अनेक फैसले हुए हैं जाे सीधे जनता से जुड़े हैं. स्पष्ट है कि हेमंत साेरेन हाें या झारखंड मुक्ति माेरचा के अन्य नेता, शिबू साेरेन की विचारधारा, उनके साेच, उनके सपनाें काे आगे बढ़ा रहे हैं. झारखंड मुक्ति माेरचा अब तेजी से देश के अन्य राज्याें में अपना विस्तार करने में लगा है. उसके पास अपना जनाधार है. हाल के कुछ वर्षाें में हेमंत साेरेन ने मुश्किलाें का सामना किया है और देश के मजबूत आदिवासी नेता के ताैर पर अपनी पहचान बनायी है, उससे देश के आदिवासियाें की उनसे अपेक्षाएं बढ़ी हैं. असम, आेड़िशा, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश अादि राज्याें में आदिवासियाें की संख्या अच्छी-खासी है. इन राज्याें में झामुमाे के पास अवसर भी हैं और यह आनेवाले दिनाें में चुनाव के दाैरान दिखेगा.


