-श्याम किशोर चौबे
राजनीतिक बुलंदियों के शिखर पर खड़े झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी झामुमो के 54 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब इसका स्थापना दिवस समारोह शिबू सोरेन के बिना मनाया जाएगा। उनकी जगह पर बेशक जाने-पहचाने किंतु गमगीन से उनके मंझले पुत्र हेमंत सोरेन का चेहरा होगा। गमगीन इसलिए कि विगत 4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में देहांत हो गया था। जिस पुत्र के पिता का छह महीने पहले देहांत हो गया हो, वह अपने पिता की थाती के स्थापना दिवस पर गमगीन ही तो रहेगा। शिबू सोरेन, जिन्हें उनके काम-धाम, आचरण और बात-व्यवहार के कारण लोग गुरुजी कहते थे, ने बड़े जतन से झामुमो को संभाले रखा। इसी कारण वे झामुमो के प्रतीक पुरुष थे। कुछ अरसा पहले जब उनकी काया शिथिल पड़ने लगी, तभी अपनी यह थाती उन्होंने हेमंत के सुपुर्द कर दी थी।
यह याद कर लेना जरूरी है कि सामाजिक कार्यों के लिए गठित सोनोत समाज मंडल को अलविदा कह, शिबू ने झामुमो की स्थापना जाने-माने तत्कालीन दो राजनीतिक पुरुषों विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर की थी। उस समय से ही इनका परम उद्देश्य था, बिहार से अलग कर पृथक झारखंड राज्य की स्थापना। हालांकि उनके काफी पहले से, 1915 के आसपास से ही, यह मांग किसी न किसी रूप में चलती रही थी, जिसे अन्य लोगां के अलावा जयपाल सिंह गोमके, एनई होरो, बागुन सुम्ब्रई आदि परवान चढ़ाते रहे थे। लेकिन झामुमो के मैदान में आते-आते जयपाल सिंह का देहांत हो चुका था, और बाकी लोग या संगठन उस तीव्रता के साथ अपनी मांग को आंदोलन का वह रूप-स्वरूप न दे सके थे, जिसकी राजनीतिक जरूरत थी।
जैसा कि आमतौर पर होता है, राजनीतिक दलों में टूट-फूट और जोड़-तोड़ चलती रहती है, झामुमो में भी ये सभी कर्मकांड होते रहे। यह कई मर्तबा टूटा और कई बार इसको यहां तक कि अलग विचारधारा वाले संघटनों से भी समझौता करना पड़ा। लेकिन शिबू सोरेन, जो भी उनके साथ चलते रहे, उनको लेकर चलते ही रहे। यही उनकी खासियत थी। वे कभी मंद पड़े तो कभी उग्र भी हुए, कभी समझौता भी किया तो कभी सीधे तन कर खड़े रहे। कभी झारखंड राज्य की मांग और इसके आंदोलन से विमुख न हुए। … और अंततः 15 दिसंबर 2000 को झारखंड राज्य अस्तित्व में आ गया। निश्चय ही, इस महान कार्य में भाजपा, कांग्रेस, वामदल, आजसू आदि की भी भूमिका रही, लेकिन इस राज्य के लिए सर्वाधिक सुदीर्घ काल तक आंदोलन चलाने का श्रेय शिबू सोरेन और झामुमो के ही नाम अंकित है।
झारखंड बना, तो कैसा बना, उसका ग्रोथ किस रूप में हुआ या हो रहा है, इस बात को थोड़ी देर के लिए विराम देकर, झामुमो के स्थापना दिवस पर हम सोचें तो यही पाते हैं कि शिबू सोरेन किंवदंति बन गये हैं। बिलकुल इतिहास पुरुष। जैसा कि आम तौर पर क्षेत्रीय दलां के साथ होता है, या अब तो राष्ट्रीय दल भी उसी लकीर पर चल निकले हैं, यह शिबू सोरेन का ही प्रताप था कि उनके तीनों बेटे और दो बहुएं राजनीति के क्षेत्र में उतरे और विधायक बने। इनमें मंझले पुत्र हेमंत सोरेन ने चार मर्तबा मुख्यमंत्री पद हासिल करने का गौरव प्राप्त किया। फिलहाल, वे चौथी मर्तबा मुख्यमंत्री हैं, और उनके ही नेतृत्व में इस बार का पार्टी स्थापना दिवस समारोह होना है।
शिबू सोरेन और उनके कतिपय जुझारू सहयोगियों ने झामुमो का जो ताना-बाना बुना, उसकी एक जबर्दस्त खासियत यह रही कि चाहे जिन भी कारणों से इस संघटन से जो लोग अलग हुए, उनमें इक्के-दुक्के ही सफल राजनेता साबित हो सके, अन्यथा बाकी लोगों की राजनीतिक यात्रा पर या तो विराम लग गया, या वे पुनः झामुमो में लौटने को विवश हो गये। अन्य दलों के सापेक्ष झामुमो के नेताओं में, चाहे जिस भी पद पर रहे हों, जनता से बिना तामझाम के जुड़ाव की घुट्टी पिलाई जाती रही, वही उनकी असल पूंजी बनी।
सवाल यह भी है कि शिबू सोरेन जिस व्यवस्था के हिमायती थे, जिस कॉज को लेकर वे अनथक परिश्रम करते रहे, वह अबतक हासिल हो सका है या नहीं! जल, जमीन, जंगल उनका नारा ही नहीं, मंत्र था और जन-जन तक शिक्षा, नशाबंदी और गांवों का विकास परम ध्येय था। इस कसौटी पर खरा उतरने में राज्य फिलहाल सफल नहीं हो सका है। शिबू सोरेन के उत्तराधिकारी जूनियर सोरेन यानी हेमंत सोरेन के सामने यह बड़ी चुनौती है।
यह अलग बात है कि चुनावी राजनीति में शिबू सोरेन ने जो मुकाम हासिल किया था, हेमंत उससे कहीं आगे निकल चुके हैं। इसके बावजूद जिस सामाजिक क्रांति की सोच शिबू पाले हुए थे, उसे पूरा करना हेमंत की जवाबदेही है। शिबू आंदोलन की उपज थे, हेमंत को राजनीति विरासत में मिली। शिबू की किस्मत में शायद राजयोग था ही नहीं। वे केंद्र में मंत्री बने, तब भी और अपने सपनों के झारखंड में तीन मर्तबा मुख्यमंत्री बने, तब भी ये महिमामंडित कुर्सियां उनके लिए बेहद अल्पकालिक साबित हुईं। दूसरी ओर हेमंत गठबंधन में ही सही, लगातार दो मर्तबा बहुमत और अपार बहुमत पाने में कामयाब रहे। इस लिहाज से राज्य ने उन पर बड़े दायित्व का बोझ डाला गया है। कम-अज-कम अपने पिता की सोच का झारखंड बना सके, तो निश्चय ही वे वाहवाही के हकदार होंगे।
भारत सरकार ने शिबू सोरेन को लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन, आदिवासी अधिकारों की लड़ाई और झारखंड राज्य के गठन में अहम भूमिका निभाने के लिए मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजने की विगत 26 जनवरी को घोषणा कर अच्छा किया है, लेकिन वे इससे भी बड़े सम्मान के अधिकारी थे, जो झामुमो और झारखंड की मांग है।
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