रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर हो रहा कम
नई दिल्ली । तेजी से बढ़ती कृत्रिम रोशनी अब पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बन रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी हर रात प्रकाश प्रदूषण का सामना कर रही है। वहीं, दुनिया का करीब 80 फीसदी हिस्सा किसी न किसी रूप में आर्टिफिशियल रोशनी के प्रभाव में है। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2022 के बीच वैश्विक स्तर पर रात के समय कृत्रिम रोशनी में करीब 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। भारत के बड़े शहरों की रातें पहले की तुलना में करीब 60 गुना ज्यादाचमकीली हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल इंसानों पर ही नहीं, बल्कि कीटों, पशुओं और पक्षियों के प्राकृतिक जीवन चक्र पर भी पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक अत्यधिक रोशनी रात्रिकालीन जीवों के व्यवहार को बदल रही है। इससे पक्षियों के प्रवास, प्रजनन, घोंसला निर्माण और अंडों से बच्चों के निकलने जैसी जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं। कई रात्रिचर कीटों की संख्या में भी लगातार गिरावट देखी जा रही है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक असर पड़ने की आशंका है। मानव स्वास्थ्य पर भी प्रकाश प्रदूषण के गंभीर प्रभाव सामने आ रहे हैं। रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, जो नींद को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है। इसके कारण अनिद्रा, तनाव और जैविक घड़ी में गड़बड़ी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इसका प्रभाव रहने पर मधुमेह, अवसाद, हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है। दुनिया के कई देशों ने प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम लागू किए हैं। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइट का प्रकाश ऊपर की ओर फैलने पर तीन लाख रुपए से ज्यादा का जुर्माना लगाया जा सकता है। फ्रांस में रात एक बजे के बाद दुकानों और कार्यालयों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है, जबकि जर्मनी में रिहायशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज रोशनी पर बैन लगाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा बचत के साथ-साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित करना समय की जरुरत है।


