पूर्वजों का स्मरण, संस्कारों का संरक्षण और भावी पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी का संदेश
देवघर। पितृपक्ष भारतीय ऋषि परंपरा की महनीय देन है। पूर्वजों का स्मरण, संस्कारों का संरक्षण और भावी पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी इस परंपरा के प्रमुख भाव हैं। डॉ. परशुराम तिवारी, शिक्षाविद एवं जिला शिक्षक शिक्षा संस्थान, जसीडीह में कार्यरत, कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में पूर्वज केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी चेतना, संस्कार और जीवन-दृष्टि के आधार हैं।
श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह परंपरा याद दिलाती है कि हमारा वर्तमान कई पीढ़ियों के संघर्ष, त्याग और अनुभव की देन है। इसलिए अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को समझना भी जरूरी है। पितृपक्ष को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
इसका व्यापक संदेश स्मरण, श्रद्धा, कृतज्ञता और जिम्मेदारी है। पूर्वजों के श्रेष्ठ मूल्यों को जीवन में उतारना, बुजुर्गों का सम्मान करना, जरूरतमंदों की सहायता और समाज के प्रति संवेदनशील रहना ही इस परंपरा को सार्थक बनाता है। डॉ. तिवारी के अनुसार वास्तविक विरासत केवल जमीन-जायदाद नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार, ज्ञान, संघर्ष की क्षमता और मानवता है। 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलने वाले पितृपक्ष में पूर्वजों की स्मृति में तिल मिश्रित जल अर्पित कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करें और उनके श्रेष्ठ मूल्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लें।


