नई दिल्ली । भारतीय समाज और सोने का रिश्ता सदियों पुराना है। त्योहारों की रौनक हो या शादियों का उल्लास, सोना हर मोड़ पर भारतीय परिवारों के सुख-दुख का साथी रहा है। एक अनुमान के मुताबिक आज भी भारत के घरों में करीब पच्चीस हजार टन सोना पड़ा है, जो काफी हद तक निष्क्रिय है, अलमारियों में बंद है और जिसकी देश भर में कोई एक तय कीमत भी नहीं है, लेकिन बदलते समय के साथ सोने के बाजार की यह पूरी तस्वीर अब बदल रही है। साल 2024 से सरकार ने नए सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (एसजीबी) को जारी करना पूरी तरह बंद कर दिया था, जिसके बाद बजट 2026 के नए नियमों ने इसके टैक्स फायदों को भी सीमित कर दिया। दूसरी तरफ नवंबर 2025 में सेबी ने मोबाइल ऐप्स पर मिलने वाले अनरेगुलेटेड डिजिटल गोल्ड को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की थी।
रिपोर्ट के मुताबिक इस बदलते सिस्टम के बीच नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के ‘इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स’ (ईजीआर) ने निवेश की दुनिया में कदम रखा। अब देश के आम निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सोने में निवेश का सबसे व्यावहारिक, सुरक्षित और किफायती रास्ता कौन सा है। क्या हमें सुनार की दुकान से पारंपरिक सोना खरीदना चाहिए, सालों से चल रहे गोल्ड ईटीएफ में बने रहना चाहिए या फिर नए ईजीआर को अपनाना चाहिए।
पारंपरिक रूप से भारत में सोने की खरीद हमेशा से आभूषणों या सिक्कों के रूप में की जाती रही है, जिसे हम फिजिकल गोल्ड कहते हैं। सुनार की दुकान पर जाकर अपनी आंखों के सामने सोने को देखना और उसे छूकर महसूस करना हमेशा से भारतीयों की पसंद रही है। हंसा रिसर्च ग्रुप प्राइवेट लिमिटेड की एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट इस उपभोक्ता व्यवहार की गहराई को समझाते हुए कहती हैं कि भारत में गहनों और सोने का अपना एक सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व है, क्योंकि यह लोगों को ‘टैन्जिबल ओनरशिप’ यानी संपत्ति को छूकर महसूस करने और खुद के पास सुरक्षित रखने की वास्तविक खुशी देता है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में इसकी मांग हमेशा बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि अगर आप इसे सिर्फ निवेश के नजरिए से देखें, तो फिजिकल गोल्ड सबसे महंगा और घाटे वाला विकल्प साबित होता है। सोना खरीदते ही सबसे पहले आपको 3फीसदी जीएसटी देना पड़ता है। इसके अलावा ज्वेलर्स 5फीसदी से लेकर 20फीसदी या उससे भी ज्यादा तक मेकिंग चार्ज वसूल लेते हैं, जिसका निवेश से कोई फायदा नहीं होता। फिर इसकी सुरक्षा की चिंता अलग रहती है। या तो घर में चोरी का डर बना रहता है, या बैंक लॉकर के लिए हर साल मोटा किराया देना पड़ता है। सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब आप सोना बेचने जाते हैं। उस समय ज्वेलर्स पुराने मेकिंग चार्ज का पैसा तो वापस नहीं देते, ऊपर से शुद्धता जांचने के नाम पर सोने के वजन या कीमत में भी कटौती कर लेते हैं।
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now


