सारण। सारण विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला जिसे हरिहर क्षेत्र मेला के नाम से भी जाना जाता है, बिहार के सारण जिले में गंगा और गंडक नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बाबा हरिहर नाथ क्षेत्र में विधिवत शुभारंभ हो गया.
एशिया के सबसे बड़े पशु मेला के रूप में विख्यात यह मेला 9 नवंबर से 8 दिसंबर तक चलेगा. इस वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव की व्यस्तताओं और आदर्श आचार संहिता के चलते राज्य सरकार के किसी भी मंत्री या बड़े नेता का कार्यक्रम सुनिश्चित नहीं हो सका. इस बार जिला प्रशासन ने प्रशासनिक अधिकारियों से ही मेले का उद्घाटन कराने का निर्णय लिया ताकि चुनाव संबंधी कार्यों और विधि-व्यवस्था में कोई बाधा न आए. सारण के प्रमंडलीय आयुक्त, राजीव रोशन ने मुख्य अतिथि के रूप में दीप प्रज्वलन कर मेले का विधिवत शुभारंभ किया. उनके साथ सारण के जिलाधिकारी अमन समीर और वरीय पुलिस अधीक्षक डॉ. कुमार आशीष भी उपस्थित थे.
प्रमंडलीय आयुक्त राजीव रोशन ने अपने संबोधन में कहा कि सोनपुर मेला केवल पशु व्यापार का केंद्र नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, कला, और ग्रामीण-शहरी जीवन का संगम है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि चुनाव की चुनौतियों के बावजूद प्रशासन ने मेले को भव्य और सुव्यवस्थित तरीके से आयोजित करने के लिए व्यापक तैयारियां की हैं. जिलाधिकारी अमन समीर ने मेले में की गई सुरक्षा, स्वच्छता, और बेहतर बुनियादी सुविधाओं की तैयारियों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि इस वर्ष सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल और दंडाधिकारियों की तैनाती की गई है. वरीय पुलिस अधीक्षक डॉ. कुमार आशीष ने विधि-व्यवस्था और यातायात नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की बात कही और श्रद्धालुओं तथा व्यापारियों से सहयोग की अपील की. हरिहर क्षेत्र मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन शुरू होता है जिस दिन गंगा-गंडक संगम में पवित्र स्नान करने के लिए लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. इस धार्मिक स्नान को ‘सौ गोदान’ के पुण्य के बराबर माना जाता है. मेले का संबंध गज-ग्राह की पौराणिक कथा से है, जिसमें मान्यता है कि भगवान विष्णु (हरि) ने यहाँ गज (हाथी) को ग्राह (मगरमच्छ) के बंधन से मुक्त किया था. राजा-महाराजाओं के काल में यह मेला युद्ध के लिए पशुओं की खरीद-बिक्री का एक प्रमुख केंद्र था. इस साल मेले का मुख्य आकर्षण अयोध्या के राम मंदिर का मॉडल है, जो श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है. इसके अलावा, भारतीय रेलवे के इतिहास को दर्शाने वाली एक प्रदर्शनी भी लगाई गई है, जिसमें कोयला इंजन से लेकर वंदे भारत ट्रेन तक का सफर दिखाया गया है. मेले में विभिन्न सरकारी विभागों के स्टॉल लगाए गए हैं, जो ग्रामीण जनता को सरकारी योजनाओं और तकनीकों के बारे में जानकारी दे रहे हैं. राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नौका दौड़, दंगल (कुश्ती) और विभिन्न कलाओं का भी आयोजन किया जाता है, जिससे मेले आय दर्शकों एवं सैलानियों को एक नया मनोरंजन का स्तोत्र मिलाता है. समय के साथ सोनपुर मेले के स्वरूप में कई बदलाव आए हैं. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के लागू होने के बाद, 2004 से हाथियों और अन्य वन्यजीवों की बिक्री पर कानूनी रूप से रोक लगा दी गई है. हालांकि, घोड़ा, ऊँट, गाय, भैंस, कुता, बिल्ली और पक्षियों का बाज़ार आज भी सजता है. अब यह मेला सुई से लेकर खेती के उपकरण, ऊनी वस्त्र, खिलौने और रोज़मर्रा की चीज़ों की दुकानों तक सिमट गया है अब यह मेला सर्कस, थियेटर, झूले जैसे मनोरंजन के केंद्र में भी तब्दील हो गया है
.राजनेताओं की अनुपस्थिति ने भले ही उद्घाटन समारोह को एक औपचारिक रंग दिया हो, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की तत्परता और व्यवस्थाओं ने इस विश्व प्रसिद्ध मेले की परंपरा को जीवंत रखा है. सोनपुर मेला आज भी भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और ग्रामीण जीवनशैली का एक जीता-जागता प्रतीक है.


