नई दिल्ली । घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में दिल्ली की एक अदालत ने महिला की याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि कानूनी राहत पाने के लिए केवल प्रताड़ना के आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत राहत हासिल करने के लिए कम से कम एक ऐसी घटना साबित करनी होगी जो कानून में घरेलू हिंसा की परिभाषा के अंतर्गत आती हो।
न्यायिक मजिस्ट्रेट ऋषिका श्रीवास्तव पति, सास-ससुर और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ महिला की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थीं। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि उसके साथ घरेलू हिंसा की कम से कम एक घटना हुई है। सिर्फ आरोप लगाने से किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से पीड़ित मान लेना पर्याप्त नहीं है। महिला ने अपनी शिकायत में शादी के दौरान शारीरिक, यौन और भावनात्मक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए थे। उसने दावा किया था कि उसे दहेज के लिए लगातार परेशान किया गया और धमकियां दी गईं। महिला ने अपने पति पर उसकी अश्लील तस्वीरें सार्वजनिक करने की धमकी देने और उसके पिता से 35 लाख रुपये की मांग करने का भी आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता ने अदालत से संरक्षण और आवास संबंधी आदेश जारी करने, हर महीने 40 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने तथा कथित मानसिक प्रताड़ना, भावनात्मक परेशानी और यौन हिंसा के लिए 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। पति, सास-ससुर और अन्य परिजनों की ओर से पेश अधिवक्ता मनीष भदौरिया ने आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने दावा किया कि जनवरी 2021 में दस लाख रुपये देकर विवाद का निपटारा कर लिया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि महिला हर महीने 75 हजार रुपये से अधिक कमाती थी और अपनी इच्छा से अपना सामान लेकर ससुराल से चली गई थी। अदालत ने अपने फैसले में पाया कि महिला को साक्ष्य पेश करने के लिए तीन अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने न तो अपना साक्ष्य हलफनामा दाखिल किया और न ही कोई अन्य प्रमाण प्रस्तुत किया। इसके चलते 26 सितंबर को उसका साक्ष्य पेश करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि चूंकि आरोप साबित नहीं हो सके, इसलिए महिला की याचिका खारिज की जाती है।




