● संताली भाषा और ओलचिकी लिपि में बाल साहित्य के लिए बड़ी उपलब्धि
डॉ. सुमन सिंह
दुमका। अमेरिका में रह रही संताली लेखिका बंदना टुडू की द्विभाषी बाल पुस्तक ‘मनु आर मिरु वाग लिथुर आरांग’ को यूनेस्को और इंटरनेशनल बोर्ड ऑन बुक्स फॉर यंग पीपल (आईबीबीवाई) के अंतरराष्ट्रीय संग्रह में शामिल किया गया है। यह संताली भाषा और ओलचिकी लिपि में बाल साहित्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
यूनेस्को–आईबीबीवाई के इस विशेष संग्रह में दुनिया भर से प्राप्त 500 से अधिक पुस्तकों में से चयनित करीब 170 उत्कृष्ट पुस्तकें शामिल हैं। ये पुस्तकें 150 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। संग्रह का उद्देश्य स्वदेशी एवं संकटग्रस्त भाषाओं में उत्कृष्ट बाल साहित्य को सामने लाने के साथ भाषाई विविधता, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण एवं संवर्धन को बढ़ावा देना है।
इस संग्रह का आधिकारिक प्रस्तुतीकरण 6 से 9 अगस्त 2026 तक कनाडा के ओटावा में आयोजित 40वीं आईबीबीवाई वर्ल्ड कांग्रेस के दौरान किया गया। 9 अगस्त को विश्व के स्वदेशी लोगों के अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर भी इसे विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। बंदना टुडू की पुस्तक चयनित पुस्तकों की सूची में पृष्ठ 34 पर दर्ज है।
बंदना के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संग्रह में पुस्तक का चयन केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि संताल भाषा, ओलचिकी लिपि, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों की कहानियों का सम्मान है। वह इसे गुरु-गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू के ओलचिकी को व्यापक स्तर पर स्थापित करने के स्वप्न की दिशा में एक छोटा कदम मानती हैं।
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बेटे को मातृभाषा सिखाने की कोशिश से शुरू हुई यात्रा
दुमका।अमेरिका के कनेक्टिकट में पिछले करीब 15 वर्षों से रह रहीं बंदना टुडू ने अमेरिका में जन्मे अपने 12 वर्षीय बेटे रेयान को संताल भाषा और ओलचिकी सिखाने के प्रयास के दौरान इस पुस्तक की कल्पना की। उन्हें महसूस हुआ कि बच्चों के लिए संताल भाषा और ओलचिकी में गुणवत्तापूर्ण चित्र-पुस्तकों की कमी है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अंग्रेजी और संताल भाषा में द्विभाषी चित्र-पुस्तक तैयार की। ‘मनु आर मिरु वाग लिथुर आरांग’ अगस्त 2024 में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया से प्रकाशित हुई। पुस्तक का उद्देश्य बच्चों को सहज और रोचक तरीके से मातृभाषा तथा अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ना है। बंदना ने बच्चों और ओलचिकी सीखने वाले शुरुआती विद्यार्थियों के लिए ओलचिकी लेखन-अभ्यास की वर्कशीट पुस्तक भी प्रकाशित की है। बंदना टुडू मूल रूप से झारखंड के चाकुलिया(जमशेदपुर) की रहने वाली है और पिछले करीब 15 वर्षों से अमेरिका के कनेक्टिकट में रह रहीं हैं।
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पारिवारिक स्मृतियों से जुड़े हैं मनु और मिरु
दुमका। पुस्तक के मुख्य पात्र मनु और मिरु के नाम भी बंदना के परिवार से जुड़े हैं। मनु नाम उनके ससुर मनु चरण टुडू से प्रेरित है, जबकि मिरु नाम उनकी दिवंगत सास रैमणि टुडू के प्यार से पुकारे जाने वाले नाम से लिया गया है। बंदना ने इस उपलब्धि के लिए अपने माता-पिता यशोदा मुर्मू और हरिपद मुर्मू, मामाजी गणेश ठाकुर हांसदा, पति राम चंद्र टुडू तथा अपने ओलचिकी गुरुओं कर्ण मुर्मू और लाखाई बास्की के प्रति आभार व्यक्त किया है।


