जम्मू-कश्मीर के ओंकार सिंह बत्रा की सफलता कई युवाओं को कर रही प्रेरित
नई दिल्ली । एआई के दौर में जहां हर दिन नई चुनौतियां सामने आ रही हैं, वहीं युवा पीढ़ी इन चुनौतियों का समाधान खोजने और कुछ नया करने में जुटी है। आज छोटी उम्र के बच्चे भी कोडिंग सीख रहे हैं, एआई मॉडल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन रहा हैं और स्कूलों की छोटी-छोटी लैब में रोबोटिक्स पर नए प्रयोग किए जा रहे हैं। वहीं कुछ युवा देश के लिए अपना सैटेलाइट बनाने का सपना लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
मीडिया रिपोर्टि के मुताबिक जम्मू के रहने वाले ओंकार सिंह बत्रा इनकी सफलता ने कई युवाओं को प्रेरित किया है। सात साल की उम्र में वेबसाइट डिजाइन कर हर किसी को हैरान कर दिया। इसके बाद 16 साल की उम्र में सैटेलाइट बनाई और 19 की उम्र तक आते-आते वह सिलिकॉन वैली पहुंच गए और एक स्पेस-टेक स्टार्टअप के लिए 4.3 मिलियन डॉलर जुटा लिए।
बता दें ओंकार सिंह बत्रा का यह स्टार्टअप सैटेलाइट कम्यूनिकेशन की एक पुरानी परेशानी को सॉल्व करने की कोशिश कर रहा था। उस समय सैटेलाइट को कनेक्टेड रखना, जब वह ग्राउंड स्टेशन की लाइन ऑफ साइट से बाहर चला जाए। आज 20 साल की उम्र में वह स्पेस में सैटेलाइट के लिए एक कंटीन्यूअस कम्युनिकेशन लेयर विकसित कर रहे हैं। बत्रा ने केवल सात साल की उम्र में पहली वेबसाइट बना दी थी। इसके साथ ही उन्होंने 12 साल की उम्र में एक किताब भी लिखी। 13 साल की उम्र में खुद की कंपनी शुरू की और जब वह 16 साल के हुए तो, उन्होंने इनक्यूब बनाया, जिसे भारत का पहला ओपन-सोर्स सैटेलाइट कहा जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक 19 साल की उम्र तक वह सिलिकॉन वैली चले गए थे और एक स्पेस-टेक स्टार्टअप के लिए 4.3 मिलियन डॉलर जुटाए, जब सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशनों की पहुंच से बाहर हो जाएं, तब भी उन्हें जुड़े रखने का काम करता था। 12 साल की उम्र में बत्रा ने व्हेन द टाइम स्टॉप्स नाम से 49 पन्नों की एक किताब लिखी। उनकी प्रोफाइल के मुताबिक इस रचना में उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के समय फैलाव के सिद्धांत को चुनौती दी थी। बाद में उन्हें दुनिया के सबसे युवा सैद्धांतिक लेखक के रूप में मान्यता मिली। इसके बाद तकनीक उनके लिए सिर्फ शौक नहीं रही, बल्कि वह इसे अपने काम का हिस्सा बनाने लगे। 2018 में उन्होंने बत्रा टेक्नोलॉजीज की शुरुआत की और इसके बाद 2019 में यूनाइटेड इंडिया पब्लिशिंग की स्थापना की।
इनक्यूब पर काम करते हुए बत्रा को एक बड़ी समस्या का पता चला। पृथ्वी की निचली कक्षा में घूमने वाला सैटेलाइट हर समय ग्राउंड स्टेशन से संपर्क में नहीं रह सकता, जब वह ग्राउंड स्टेशन की पहुंच से बाहर चला जाता है, तो कुछ समय के लिए उसका संचार रुक जाता है। दिलचस्प बात यह है कि 2023 में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही बत्रा इंजीनियरिंग के छात्रों को पढ़ाने लगे थे। उनका स्कूली जीवन सामान्य छात्रों से काफी अलग रहा। अंतरिक्ष से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने के साथ-साथ वह आईआईटी जम्मू से भी जुड़े रहे। उन्होंने आईआईटी जम्मू के सैटेलाइट डेवलपमेंट प्रोग्राम में अतिथि प्रोजेक्ट सूत्रधार और समन्वयक के तौर पर काम किया।


