अशोक कुमार
बांकीपुर पटना के उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के कई अर्थ लगाए जा रहे हैं। पिछले तीस साल से बांकीपुर सीट पर भाजपा का कब्जा था। पिछले बीस साल से इस सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन नवीन चुनाव जीतते आ रहे थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तथा राज्यसभा में मनोनीत होने पर यह सीट खाली हुई थी । यहां सवाल यह उठता है कि भाजपा के मु यमंत्री रहते यह सीट भाजपा क्यों और कैसे हार गयी। अभी हाल में बंगाल और असम में भाजपा की भारी जीत का जश्र अभी शांत नहीं हुआ था और बांकीपुर जैसे पुराने गढ़ से भाजपा की हार यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सवर्ण मतदाता भाजपा से नाराज होने लगे हैं। यहां भाजपा के वोट बैंक माने जानेवाले लगभग 35 प्रतिशत मतदाता क्या भाजपा से नाराज थे। क्या भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपने विधानसभा क्षेत्र से प्रभाव खत्म हो गया है। ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं जिससे भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चिंतित है। जिस बिहार ने 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को बहुमत देकर सत्ता में बैठाया आज उसी भाजपा ओैर एनडीए गठबंधन की साख पर सवाल उठ रहे हैं। हालंकि उपचुनाव के नतीजे कोई खास राजनीतिक प्रभाव नहीं रखते हैं ओै र न ही राष्ट्रीय व प्रांतीय राजनीति को प्रभावित करते हैं लेकिन उनचुनाव के नतीजे भविष्य की राजनीति के संकेत जरूर छोड़ जाते हैं। बांकीपुर में भाजपा के वोट बैंक मानेजानेवाले सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी सचमुच भाजपा के लिए चिंता का विषय है। बांकीपुर उप चुनाव में भाजपा की हार का एक कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा ने वहां प्रशांत किशोर के मुकाबले कमजोर उ ाीदवार उतारा था। यूजीसी के मुदद्े को लेकर भी सवर्ण मतदाता भाजपा सरकार से नाराज थे।
मुस्लिम मतदाताओं ने राजद की महिला उम्माीवार को वोट नहीं देकर भाजपा को हराने में सक्षम मानेजानेवाल प्रशांत किशोर को एकजुट होकर मतदान किया। एक चर्चा यह भी है कि भाजपा में मुख्यमंत्री का विरोधी गुट ने भी भाजपा उम्मीदवार को साथ न देकर भीतरघात का क ाम कर प्रशांत किशोर को जिताने में अप्रत्यक्ष मदद किया । प्रशांत किशोर राजनीतिज्ञ कम चुनावी रणनीतिकार ज्यादा हैं। सजग मतदाताओंं को लगा कि प्रशांत किशोर यदि जीतते हैं तो वे राज्य के अहम मुदद्े को विधानसभा में प्रभावशाली ढंग से उठाकर सरकार क ो घेरने का काम करेंगे। उनके विजय जुलूस में महिलाओं ओैर युवाओं की अच्छी खासी भागीदारी देखी गयी। इससे यह साबित होता है कि युवाओं और महिलाओंं ने प्रशांत किशोर का अन्य उ मीदवारों की तुलना में ज्यादा पसंद किया। लेकिन यही प्रशांत किशोर ओैर उनकी पार्टी जनसुराज पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में फिसड्डी साबित हुई। उन्हें एक भी सीट हासिल नहीं हुई। यहां एक गौरतलब बात यह है कि प्रशांत किशोर ने अपने अभियान में भाजपा के मु यमंत्री समा्रट चौधरी को टारगेट कियाऔर उपराधी मु यमंत्री कहा। प्रशांत किशोर की जीत के मायने साफ है कि सवर्ण मतदाता भाजपा के मुख्यमंत्री से नाराज हैं।


