बड़े-बड़े दावों के बीच संसद में सरकार के आधिकारिक आंकड़ों ने खोली पोल
नई दिल्ली । देश में बेहतर शिक्षा और सब पढ़ें, सब बढ़ें के बड़े-बड़े दावों के बीच एक हैरान कर देने वाली और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देशभर में एक लाख से भी ज्यादा सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और प्राइवेट स्कूल ऐसे हैं जो महज एक अकेले शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसभा में शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी द्वारा दिए गए जवाब से उजागर हुआ यह आंकड़ा दिखाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात का औसतन सही दिखना, जमीनी स्तर पर शिक्षकों की भारी कमी और असमान तैनाती की कड़वी सच्चाई को छिपा देता है।
2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक ही शिक्षक तैनात है। चौंकाने वाली बात यह है कि अकेले आंध्र प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां 16,357 स्कूल सिर्फ एक मास्टर के सहारे चल रहे हैं। यह कुल राष्ट्रीय आंकड़े का 16फीसदी से भी ज्यादा है। टॉप 7 राज्य जहां हालात सबसे चिंताजनक हैं उनमें आंध्र प्रदेश: 16,357 स्कूल, झारखंड: 9,827 स्कूल, महाराष्ट्र: 9,269 स्कूल, कर्नाटक: 8,042 स्कूल, उत्तर प्रदेश: 7,874 स्कूल
राजस्थान: 7,200 स्कूल, पश्चिम बंगाल: 6,769 स्कूल ये 7 राज्य मिलकर देश भर के कुल सिंगल-टीचर स्कूलों का करीब 65फीसदी हिस्सा बनाते हैं।
यह समस्या केवल पिछड़े या दूरदराज के राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के करीब हर हिस्से में फैली हुई है। वहीं तेलंगाना: 4,793 स्कूल, तमिलनाडु: 3,957 स्कूल, असम: 3,159 स्कूल, हिमाचल प्रदेश: 3,128 स्कूल, उत्तराखंड: 2,655 स्कूल, छत्तीसगढ़: 2,461 स्कूल हैं
सबसे बेहतर स्थिति वाले राज्य/यूटी जिसमें दूसरी तरफ केरल में केवल 67, नागालैंड में 35, सिक्किम में 31, लद्दाख में 28, दिल्ली में 7 और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में केवल 1 स्कूल ही ऐसा है जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहा है। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत देश में औसतन छात्र-शिक्षक अनुपात मानकों के भीतर है। प्राइमरी लेवल: प्रति 19 बच्चों पर 1 टीचर, अपर प्राइमरी: प्रति 17 बच्चों पर 1 टीचर, सेकेंडरी: प्रति 15 बच्चों पर 1 टीचर, हायर सेकेंडरी: प्रति 23 बच्चों पर 1 टीचर हैं, लेकिन ये राष्ट्रीय औसत आंकड़े असल धरातल की उस विषमता को छिपा देते हैं, जहां एक अकेला शिक्षक स्कूल की प्रशासनिक जिम्मेदारियों, मिड-डे मील की देखरेख और अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाने पर मजबूर है।
संसद में मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों की भर्ती, सेवा शर्तें और स्कूलों में उनकी तैनाती का जिम्मा पूरी तरह से राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों का होता है। सरकार के मुताबिक पदों के खाली रहने की मुख्य वजह जिसमें शिक्षकों का सेवानिवृत्त होना या इस्तीफा देना, नए पदों का सृजन और पदों का पुनर्गठन, ग्रामीण, आदिवासी और आकांक्षी जिलों में नामांकन के आंकड़ों में लगातार बदलाव आया है। केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्यों को पारदर्शी और योग्यता-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से खाली पदों को भरने की सलाह नियमित रूप से दी जाती है और समग्र शिक्षा योजना के तहत राज्यों को वित्तीय मदद भी मुहैया कराई जा रही है।


