रांची । झारखंड उच्च न्यायालय ने एम/एस जय बी. एंटरप्राइजेज से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी अनुबंध के दौरान एक्साइज ड्यूटी की दर में कमी आती है, तो उसका लाभ ठेकेदार अपने पास नहीं रख सकता। ऐसी स्थिति में कर में हुई कमी का लाभ नियोक्ता संस्था को मिलेगा। न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने एम/एस जय बी. एंटरप्राइजेज की रिट याचिका खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (जेयूवीएनएल) द्वारा ठेकेदार के बिल से 18,49,682 रुपये की की गई कटौती पूरी तरह वैध है। इसलिए याचिकाकर्ता इस राशि की वापसी का हकदार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यदि कर की दर बढऩे पर अतिरिक्त वित्तीय भार जेयूवीएनएल वहन करता है, तो कर में कमी आने पर उसका लाभ भी उसी संस्था को मिलना चाहिए। यदि कर में कमी का लाभ ठेकेदार को रखने दिया जाए, तो यह अनुचित आर्थिक लाभ (अनजस्ट एनरिचमेंट) की स्थिति होगी, जिसे कानून स्वीकार नहीं करता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक्साइज ड्यूटी कम होने से ठेकेदार की लागत या उसके लाभांश में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि केवल उसकी कर देनदारी घटी। इसलिए कर में हुई कमी का लाभ अंतत: उस संस्था तक पहुंचना चाहिए, जिसने भुगतान किया है।
दरअसल, एम/एस जय बी. एंटरप्राइजेज को वर्ष 2009 में कतरास 10वीं एपीडीआरपी परियोजना का कार्य आवंटित किया गया था। कार्यादेश के अनुसार सामग्री की कीमत सभी करों और एक्साइज ड्यूटी सहित निर्धारित की गई थी तथा अनुबंध अवधि के दौरान इन कीमतों को स्थिर (फर्म) रखा गया था। कार्य निष्पादन के दौरान केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी की दर 8 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दी। इसके बाद जेयूवीएनएल ने ठेकेदार के बिल से 18,49,682 रुपये की कटौती कर ली। इस कटौती को चुनौती देते हुए एम/एस जय बी. एंटरप्राइजेज ने झारखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि कार्यादेश के अनुसार अनुबंध मूल्य पूरी तरह निश्चित था और उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। इसलिए एक्साइज ड्यूटी में कमी के आधार पर बिल से राशि काटना अवैध है।
अपने पक्ष में याचिकाकर्ता ने सेल ऑफ गुड्स एक्ट, 1930 की धारा 64ए तथा उच्चतम न्यायालय के नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड मामले के निर्णय का भी हवाला दिया। वहीं, जेयूवीएनएल की ओर से अदालत को बताया गया कि कार्यादेश के साथ निविदा (एनआईटी) की शर्तें भी अनुबंध का अभिन्न हिस्सा थीं। इन शर्तों में स्पष्ट प्रावधान था कि कर एवं शुल्क में होने वाले वैधानिक परिवर्तन का समायोजन वास्तविक आधार पर किया जाएगा। इसलिए एक्साइज ड्यूटी में कमी का लाभ भी जेयूवीएनएल को मिलना चाहिए। निगम का तर्क था कि यदि यह लाभ ठेकेदार को दे दिया जाए, तो उसे अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त होगा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने जेयूवीएनएल के पक्ष को स्वीकार करते हुए ठेकेदार की याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि कर में कमी से होने वाला वित्तीय लाभ भुगतान करने वाली संस्था को ही प्राप्त होगा।


