नई दिल्ली । सेमी हाई-स्पीड और बुलेट ट्रेन के इस आधुनिक दौर में राजस्थान में एक ऐसी ऐतिहासिक ट्रेन भी आज तक संचालित हो रही है, जिसका उद्देश्य पिछले लगभग 145 वर्षों में नहीं बदला। आज देश में यात्रियों और माल परिवहन के लिए अत्याधुनिक रेल सेवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन इस ट्रेन का एकमात्र काम सांभर झील में तैयार होने वाले नमक को उत्पादन स्थल से भंडारण केंद्र तक पहुंचाना है। इसी वजह से इसे देश की सबसे अनोखी नमक रेल के रूप में जाना जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित सांभर झील भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। यहां सदियों से बड़े पैमाने पर नमक का उत्पादन किया जाता रहा है। अंग्रेजी शासन के दौरान नमक को झील के उत्पादन क्षेत्र से गोदामों तक पहुंचाना बड़ी चुनौती था, क्योंकि आसपास का इलाका दलदली और मुलायम मिट्टी वाला था। ऐसे में सड़क परिवहन प्रभावी नहीं था। इस समस्या के समाधान के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने वर्ष 1876 में यहां मीटर गेज और नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाई। तभी से यह विशेष रेल सेवा लगातार नमक ढुलाई का काम कर रही है। शुरुआती दौर में इस ट्रेन को भाप इंजन खींचते थे, लेकिन समय के साथ उनकी जगह पुराने डीजल इंजनों ने ले ली। बताया जाता है कि वर्तमान में उपयोग किए जा रहे डीजल इंजन भी लगभग 50 से 60 वर्ष पुराने हैं।
वहीं, नमक ढोने वाले कई वैगन आज भी लकड़ी और लोहे की पारंपरिक संरचना वाले हैं, जो इस रेल सेवा को और अधिक ऐतिहासिक बनाते हैं। इस ट्रेन में आम यात्रियों को सफर करने की अनुमति नहीं होती और इसका संचालन केवल नमक परिवहन के लिए किया जाता है। सांभर झील केवल नमक उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यटन और फिल्मांकन के लिए भी प्रसिद्ध है। अभिनेता आमिर खान अभिनीत फिल्म पीके में इस ऐतिहासिक रेल लाइन और नमक रेल की झलक दिखाई गई थी। इसके अलावा फिल्म गुलाल तथा गायक हंसराज हंस के एक संगीत वीडियो में भी यह ऐतिहासिक ट्रेन नजर आ चुकी है। इससे इसकी पहचान देश-विदेश के पर्यटकों के बीच और बढ़ी है। वर्तमान में सांभर झील में नमक उत्पादन, रखरखाव और विपणन का कार्य सांभर साल्ट्स लिमिटेड द्वारा किया जाता है, जो हिंदुस्तान साल्ट्स लिमिटेड और राजस्थान सरकार का संयुक्त उपक्रम है।
कंपनी इस ऐतिहासिक रेलवे नेटवर्क के संरक्षण और रखरखाव का भी जिम्मा संभालती है। सांभर क्षेत्र में आज भी लगभग 45 किलोमीटर मीटर गेज और 24 किलोमीटर नैरो गेज रेलवे लाइन उपयोग में है, जो भारतीय रेलवे की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।रेल मार्ग कई आबादी वाले इलाकों से होकर गुजरता है। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रास्ते में सात रेलवे फाटक बनाए गए हैं, जहां ट्रेन के गुजरने से पहले कर्मचारियों द्वारा फाटक बंद कर दिए जाते हैं। इससे दुर्घटनाओं की आशंका कम रहती है और नमक परिवहन सुचारु रूप से जारी रहता है। आज जब भारतीय रेलवे आधुनिक तकनीक और तेज रफ्तार ट्रेनों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब सांभर झील की यह ऐतिहासिक नमक रेल अतीत और वर्तमान के बीच एक जीवंत कड़ी बनी हुई है। यह केवल नमक ढोने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे और औद्योगिक इतिहास की एक अनमोल धरोहर भी है। यही कारण है कि इसे देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक सांभर पहुंचते हैं और इस विरासत को करीब से देखने का अनुभव प्राप्त करते हैं। भारतीय रेलवे ने भाप इंजन से लेकर वंदे भारत जैसी आधुनिक सेमी हाई-स्पीड ट्रेनों तक लंबा सफर तय कर लिया है। आज देश में यात्रियों और माल परिवहन के लिए अत्याधुनिक रेल सेवाएं उपलब्ध है, लेकिन राजस्थान की नमक ढोने वाली रेल की बात ही कुछ अलग है।


