मुंबई । जब भी आप घर में रखी सोने की ज्वैलरी, सिक्के या बिस्किट बेचने की सोचते हैं, तब सिर्फ उसकी मौजूदा कीमत ही मायने नहीं रखती। दरअसल, इस पर लगने वाला टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि वह सोना आपने खुद खरीदा था, किसी से तोहफे में मिला था या विरासत में मिला है। इन तीनों ही स्थितियों में टैक्स के नियम अलग-अलग होते हैं, जिन्हें बेचना शुरू करने से पहले समझना बेहद जरूरी है, ताकि बाद में कोई परेशानी न हो। यदि आपने अपनी ज्वैलरी खुद खरीदी है और 24 महीने बाद बेचते हैं, तब मुनाफे पर 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (एलटीसीजी) टैक्स लगेगा। वहीं, अगर 24 महीने पूरे होने से पहले बेच दिया जाता है, तब मुनाफा आपकी कुल आय में जुड़ जाएगा और आपकी इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से उस पर टैक्स देना होगा।
लेकिन विरासत में मिले सोने पर तुरंत कोई टैक्स नहीं लगता, लेकिन जब आप बेचते हैं, तब टैक्स देना पड़ता है। यहां खास बात यह है कि टैक्स की गणना करते समय सोने के पहले मालिक, यानी आपके माता-पिता या दादा-दादी ने गहने को कब और कितने में खरीदा था, उसी को आधार माना जाएगा। उनका होल्डिंग पीरियड भी आपके साथ जुड़ जाता है, जिससे अक्सर यह सीधे लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट बन जाता है।
तोहफे में मिले सोने के नियम भी भिन्न हैं। यदि यह सोना माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या अन्य निर्धारित रिश्तेदारों से मिला है, तब प्राप्त करने पर कोई टैक्स नहीं लगता। हालांकि, अगर किसी गैर-रिश्तेदार से एक वित्तीय वर्ष में 50,000 रुपये से अधिक का सोना तोहफे में मिलता है, तब उसकी पूरी कीमत अन्य स्रोतों से आय के तहत टैक्सेबल हो सकती है। इस सोने को बेचने पर भी टैक्स का आकलन पिछले मालिक की खरीद कीमत और होल्डिंग पीरियड के आधार पर ही होगा।
टैक्स बचाने और सही गणना के लिए सोने की खरीदारी के सभी बिल संभालकर रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्वैलरी खरीदते समय चुकाया गया 3 प्रतिशत जीएसटी, मेकिंग चार्ज और उस पर दिया गया जीएसटी भी खरीद लागत में शामिल किया जा सकता है। इससे आपकी कैपिटल गेन की राशि कम होगी और टैक्स का बोझ भी घट सकता है। इसी तरह, सोना बेचते समय दिए गए ब्रोकरेज या अन्य ट्रांसफर खर्च भी कुछ मामलों में घटाए जा सकते हैं।
डिजिटल गोल्ड पर भी भौतिक सोने जैसे ही टैक्स नियम लागू होते हैं। हालांकि, गोल्ड ईटीएफ (ईटीएफ) के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन का पीरियड सिर्फ 12 महीने है, जिससे यह टैक्स के लिहाज से अधिक फायदेमंद हो सकता है। सोने की बिक्री से जुड़े टैक्स को लेकर कोई परेशानी न हो, इसके लिए यह समझना आवश्यक है कि सोना आपने खरीदा था, उपहार में मिला था या विरासत में प्राप्त हुआ है। आपकी जरूरत और निवेश का मकसद भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन सही टैक्स प्लानिंग के लिए सोने की उत्पत्ति जानना ही पहला कदम है।


