राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड सरकार ने 2026 में पहली बार दिल्ली में “नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन” का आयोजन किया। इसका मकसद था – झारखंड को सिर्फ “खनन वाला राज्य” की छवि से निकालकर “निवेश, टेक्नोलॉजी और टूरिज्म डेस्टिनेशन” के रूप में पेश करना। दो दिन के इस आयोजन का आंकलन चार पैमानों पर किया जा सकता है: निवेश, नीति, ब्रांडिंग और सियासी संदेश।
प्रमुख निवेश: नवीन जिंदल ग्रुप ने स्टील, परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) के क्षेत्रों में ₹ 70,000 करोड़ से अधिक के निवेश की घोषणा की, जिसमें अकेले ₹ 40,000 करोड़ का निवेश स्टील सेक्टर में किया जाएगा।
रोजगार सृजन: इन समझौतों से राज्य में 70,000 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
पर्यटन और उद्योग: ‘ईज माय ट्रिप’ और ‘टाटा मोटर्स’ के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने और ‘हीरो साइकिल’ व ‘एवन’ के साथ साइकिल निर्माण संयंत्र स्थापित करने पर सार्थक चर्चा हुई।
नई नीतियां: इस मौके पर राज्य की पहली एआई पॉलिसी, टेक्सटाइल पॉलिसी और पर्यटन नीतियों को निवेशकों के सामने पेश किया गया।
सरकार ने दावा किया कि दो दिन में स्टील, न्यूक्लियर पावर, आईटी, टेक्नोलॉजी और टूरिज्म सेक्टर में कुल 99 हजार करोड़ रुपये के एमओयू में हस्ताक्षर हुए। इसका विशेष महत्व क्यों है? अब तक झारखंड का 80 प्रतिशत निवेश सिर्फ खनन और स्टील में आता था। इस बार टेक्नोलॉजी, एआई, टूरिज्म और न्यूक्लियर एनर्जी को भी जोड़ा गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खुद कहा- “झारखंड की पहचान केवल माइंस नहीं, माइंड्स से भी होनी चाहिए”।
रोजगार: “झारखंड विजन 2050” के तहत 10 हजार करोड़ निवेश और एक लाख रोजगार का रोडमैप घोषित हुआ। एआई नीति भी इसी विजन का हिस्सा है।
दिल्ली में मंच: राज्य सरकारें आमतौर पर अपने राज्य में इन्वेस्टर समिट करती हैं। दिल्ली में करने से राष्ट्रीय मीडिया, केंद्रीय मंत्रियों और बड़ी कंपनियों के मुख्यालय तक सीधी पहुंच मिली।
एमओयू का मतलब “इरादा पत्र” होता है। जमीन पर पैसा कब आएगा, ये 2-3 साल में पता चलेगा। 2017 के मोमेंटम झारखंड में भी बड़े एमओयू हुए थे, पर क्रियान्वयन धीमा रहा। इसलिए क्रियान्वयन सेल बनाना जरूरी होगा।
एआई नीति: झारखंड देश के उन 5-6 राज्यों में शामिल हुआ जिन्होंने अलग से एआई नीति बनाई। इसका फोकस – ई-गवर्नेंस, हेल्थ, एग्रीकल्चर और स्किल डेवलपमेंट में एआई का इस्तेमाल।
झारखंड विजन 2050: 10 हजार करोड़ निवेश, एक लाख रोजगार का रोडमैप।
झारखंड के पास प्रतिभा की कमी नहीं है, पर पलायन बड़ी समस्या है। एआई और आईटी को बढ़ावा देकर रांची, जमशेदपुर, धनबाद को “टियर-2 स्टार्टअप हब” बनाया जा सकता है। इससे पढ़े-लिखे युवाओं को राज्य में ही काम मिलेगा।
नीति बनाना आसान है, लागू करना मुश्किल। इसके लिए डेटा सेंटर, स्किल यूनिवर्सिटी और निजी भागीदारी चाहिए। वित्त विभाग से बजट क्लियरेंस सबसे बड़ी चुनौती होगी और इसी विभाग को लेकर हाल में मंत्री राधाकृष्ण किशोर नाराज भी दिखे हैं।
मुख्यमंत्री का बयान “माइंस नहीं, माइंड्स” एक नया नैरेटिव देता है। इसका मकसद निवेशकों को ये बताना कि झारखंड में मानव संसाधन, शिक्षा और टेक्नोलॉजी की क्षमता है।साथ ही पहली बार टूरिज्म को बड़े निवेश के क्षेत्र में गिना गया। झारखंड में इको-टूरिज्म, धार्मिक पर्यटन और आदिवासी संस्कृति की अपार संभावनाएं हैं। दिल्ली में आयोजन से ये संदेश गया कि झारखंड सरकार केंद्र से टकराव नहीं, सहयोग चाहती है। लेकिन ब्रांडिंग तभी सफल होगी जब जमीन पर सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था और सिंगल विंडो क्लियरेंस दिखे। निवेशक एमओयू से पहले इज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग देखते हैं।
यह आयोजन महागठबंधन के लिए ऑक्सीजन प्रदान कर सकता है। जुलाई 2026 में ही कांग्रेस के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सुरक्षा लौटाई थी और भाषा-नियोजन नीति को लेकर नाराजगी जताई थी। ऐसे समय में दिल्ली में भव्य आयोजन के दो सियासी फायदे हुए।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आधी कैबिनेट के साथ दिल्ली में मोर्चा संभाला। इससे ये संदेश गया कि अंदरुनी खटपट के बावजूद सरकार काम कर रही है। भाजपा शासित केंद्र के सामने झारखंड ने कहा “हम विकास के लिए तैयार हैं, मदद करें”। ये टकराव वाली राजनीति से अलग रास्ता है।
झारखंड की हेमंत सरकार को याद रखना चाहिए कि 2014-2019 में रघुवर दास सरकार ने भी मोमेंटम झारखंड किया था। अधिकतर एमओयू जमीन पर नहीं उतरे। इस बार “मॉनिटरिंग अथॉरिटी” कौन होगी, ये स्पष्ट नहीं है। भूमि और पर्यावरण को लेकर भी झारखंड में सदैव पेंच फंसी रहती है। स्टील और न्यूक्लियर प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण और आदिवासी सहमति सबसे बड़ा पेंच है। कंसल्टेशन में इस पर कोई ठोस रोडमैप नहीं दिखा।
दिल्ली में बड़े उद्योगपतियों से बात हुई, पर झारखंड के एमएसएमई, स्टार्टअप और आदिवासी उद्यमियों की आवाज कितनी सुनी गई, ये सवाल है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि सरकार के अंदर वित्तीय मामलों की फाइल नहीं लटकनी चाहिए। खुद वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कैबिनेट में कहा कि “फाइलें महीनों लटकती हैं”। अगर फाइलें नहीं चलेंगी तो 99 हजार करोड़ का क्या होगा?
कुल मिलाकर कहा जाये तो यह आयोजन काफी हद तक सफल रहा। 99 हजार करोड़ के एमओयू एक रिकॉर्ड है। “माइंस से माइंड्स” वाला नैरेटिव झारखंड के लिए नया है। एआई नीति और विजन 2050 से युवा वर्ग को उम्मीद मिली। दिल्ली में आयोजन से राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की साख बढ़ी। लेकिन एमओयू से फैक्ट्री तक का रास्ता लंबा है। अंदरूनी समन्वय और ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती अब भी सबसे बड़ी बाधा है। जमीन, विस्थापन और पर्यावरण के सवालों के जवाब बाकी हैं। सरकार ईमानदारी पूर्वक काम करेगी तभी कागज की योजनाएं धरातल पर उतर पाएंगी। सरकार को अगले छह महीने में तीन काम करने होंगे। हर एमओयू के लिए नोडल अधिकारी और टाइमलाइन तय करना होगा। सिंगल विंडो सिस्टम को सच में “सिंगल” बनाना होगा और स्थानीय युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर इन प्रोजेक्ट में जोड़ना होगा। अगर ये तीन काम हो गए तो ये कंसल्टेशन सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि झारखंड के आर्थिक बदलाव की शुरुआत मानी जाएगी। वरना ये भी फाइलों में बंद एक और मोमेंटम बनकर रह जाएगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सही कहा है – पहचान “माइंड्स” से बनेगी। अब देखना है कि वो “माइंड्स” को मौका कब और कैसे मिलता है।
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