नई दिल्ली । आमतौर पर जहरीले सांपों का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित शेतपाल गांव में कोबरा समेत कई प्रजातियों के सांप इंसानों के साथ एक ही घर में रहते हैं। शेतपाल गांव इस अनोखी परंपरा के कारण देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा के बावजूद यहां सांप के काटने का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है। पुणे से लगभग 200 किलोमीटर दूर मोहोल तालुका में बसे शेतपाल गांव में हर घर में सांपों के लिए विशेष स्थान बनाया जाता है। इस स्थान को स्थानीय भाषा में “देवस्थान” या “देवघर” कहा जाता है। यह आमतौर पर दीवार में बना एक आला या छोटा कमरा होता है, जहां सांप स्वतंत्र रूप से आ-जा सकते हैं। गांववासी सांपों को परिवार का हिस्सा मानते हैं और उनके प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सांप भगवान शिव का स्वरूप माने जाते हैं। इसी कारण उन्हें नुकसान पहुंचाना पाप समझा जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि जिस प्रकार वे सांपों का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार सांप भी गांव के लोगों को कोई हानि नहीं पहुंचाते। यही वजह है कि गांव में इंसानों और सांपों के बीच एक अनोखा सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। शेतपाल में कोबरा, वाइपर और अन्य कई प्रजातियों के सांप बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। गांव की गलियों, घरों और आंगनों में उनका दिखना सामान्य बात है। बच्चे भी उनसे डरने के बजाय उन्हें परिवार के सदस्य की तरह देखते हैं। कई बच्चे सांपों को प्यार से “मामा” कहकर पुकारते हैं। यहां शादी-विवाह, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य शुभ अवसर भी सांपों की मौजूदगी में संपन्न होते हैं।
ग्रामीण मानते हैं कि यदि कोई सांप घर छोड़कर चला जाए तो यह अशुभ संकेत माना जाता है। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक भी बड़ी संख्या में शेतपाल पहुंचते हैं। यही कारण है कि यह गांव “स्नेक विलेज” यानी “सांपों का गांव” के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है। वन्यजीव विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने भी इस गांव की व्यवस्था का अध्ययन किया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सांपों को यहां कभी नुकसान नहीं पहुंचाया जाता और उन्हें सुरक्षित वातावरण मिलता है, इसलिए उनमें आक्रामकता कम देखी जाती है।
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