संताल हूल दिवस पर मैं संताल हूल के महानायक सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं। 30 जून 1855 को शुरू हुआ संताल हूल केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह नहीं था, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन, स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा का ऐतिहासिक जनआंदोलन था।
आज 171 वर्ष बाद भी संताल हूल की प्रासंगिकता बनी हुई है। हूल हमें अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। उस समय महाजनी शोषण, जमींदारी अत्याचार और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समाज ने आवाज उठाई थी। आज परिस्थितियां बदली हैं, लेकिन चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।
आज भी आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन की रक्षा, विस्थापन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों से जूझ रहा है। ऐसे समय में संताल हूल का संदेश हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग और एकजुट रहने की सीख देता है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा हमेशा से आदिवासियों, मूलवासियों, गरीबों और वंचितों के हक की लड़ाई लड़ता रहा है। हमारी प्रतिबद्धता है कि शहीदों के सपनों का झारखंड बने, जहां सामाजिक न्याय, समान अवसर और सम्मानजनक जीवन हर व्यक्ति को मिले।
संताल हूल दिवस केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह संकल्प लेने का दिन भी है कि हम शहीदों के आदर्शों पर चलकर न्यायपूर्ण, समतामूलक और सशक्त समाज के निर्माण के लिए निरंतर कार्य करेंगे।
हूल जोहार!
(लेखक झामुमो के वरिष्ठ नेता और दुमका के सांसद हैं।)
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now


