डॉ. अर्पणा कुमारी
इतिहास के पन्नों से गूंजती हूल की आवाज 30 जून 1855 को भोगनाडीह की माटी से फूटा संताल हूल (विद्रोह) महज एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और इंसानी गरिमा की रक्षा के लिए लड़ा गया भारत के जनजातीय समुदाय का पहला जन-आंदोलन था। सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो के नेतृत्व में उपजा यह विद्रोह ब्रिटिश साम्राज्यवाद, स्थानीय महाजनों और ‘दिकुओं’ (शोषक बाहरी तत्वों) के क्रूर दमन के खिलाफ एक सामूहिक हुंकार थी। कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री’ में इसे भारत की पहली जन-क्रांति के रूप में स्वीकार किया।
आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में झारखंड, विशेषकर संताल परगना प्रमंडल और इसके हृदय स्थल दुमका जिले की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना का विश्लेषण करते हैं, तो हूल की विरासत और समकालीन चुनौतियों के बीच एक गहरा अंतर्विरोध नजर आता है। एक समाजशास्त्री और महिला दृष्टिकोण से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि जिन बुनियादी सवालों जैसे भूमि का अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, स्वायत्तता और शोषण से मुक्ति को लेकर तीर-धनुष उठाए गए थे, वे सवाल आज भी नए रूपों में दुमका और आसपास के क्षेत्रों में मुँह बाए खड़े हैं।
हूल की गौरवशाली विरासत समकालीन झारखंड, विशेषकर संताल परगना की महिलाओं और हाशिए के समाजों के सशक्तीकरण में कहाँ तक फलीभूत हुई है और वर्तमान समय की संरचनात्मक चुनौतियाँ क्या हैं।
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समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण: ऐतिहासिक गौरव बनाम समकालीन विडंबनाएँ
समाजशास्त्रीय नजरिए से संताल हूल एक ‘समतामूलक समाज’ की स्थापना का प्रयास था। संताल समाज पारंपरिक रूप से वर्गहीन और जातिहीन रहा है, जहाँ सामूहिक चेतना और सामुदायिक सहभागिता जीवन का मुख्य आधार है। हूल ने इसी सामुदायिक एकजुटता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया था।
1. भूमि संबंधों का विघटन और एसपीटी एक्ट की प्रासंगिकता:
हूल के परिणामस्वरूप ही ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और ‘संताल परगना टेनेंसी एक्ट’ (SPT Act, 1876) तथा संताल परगना जिले का निर्माण करना पड़ा। यह कानून आदिवासियों की जमीन के गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण पर कड़ाई से रोक लगाता है।
परंतु, समकालीन दुमका और संताल परगना के अन्य जिलों (पाकुड़, साहिबगंज, गोड्डा, देवघर, जामताड़ा) में समाजशास्त्रीय अध्ययन दर्शाते हैं कि ‘सद्भाव’ और ‘विकास’ के नाम पर कानून की आत्मा को लगातार ठेस पहुँचाई जा रही है। शहरीकरण, अवैध खनन (पत्थर और कोयला), और बड़े नीतिगत ढांचागत विकास के कारण आदिवासियों की जमीनें अप्रत्यक्ष रूप से उनके हाथ से निकल रही हैं। दुमका के ग्रामीण इलाकों में भूमिहीनता बढ़ रही है, जिससे पारंपरिक सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। जब भूमि (जो संताल संस्कृति में सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि टोटम और पूर्वजों की आत्मा का निवास है) छिनती है, तो पूरा सामाजिक ढांचा ढह जाता है।
2. विकास का असंतुलित मॉडल और विस्थापन
संताल परगना में कोयला खदानों, ताप विद्युत परियोजनाओं (जैसे गोड्डा या अन्य क्षेत्रों में) और दुमका में बुनियादी ढांचे के विकास ने स्थानीय आबादी को विस्थापित किया है। समाजशास्त्रीय भाषा में इसे “विकास जनित विस्थापन” कहा जाता है। यह विस्थापन आदिवासियों को उनकी जड़ों से काटकर शहरों की मलिन बस्तियों में दिहाड़ी मजदूर बनने पर मजबूर कर देता है। हूल की विरासत स्वावलंबन की बात करती थी, लेकिन वर्तमान नीतियां उन्हें निर्भरता और लाचारी की ओर धकेल रही हैं।
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फूलो-झानो की धरती पर आधी आबादी का यथार्थ
जब हम संताल हूल का इतिहास पढ़ते हैं, तो सिदो-कान्हू के साथ फूलो और झानो का नाम गर्व से लिया जाता है, जिन्होंने अपनी कुल्हाड़ियों से दर्जनों ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। यह इस बात का प्रमाण है कि संताल समाज में महिलाएं कभी पर्दे में या पुरुषों से पीछे नहीं रहीं। वे युद्ध के मैदान से लेकर खेतों तक कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं।
लेकिन आज, महिला दृष्टिकोण से संथाल परगना और दुमका जिले की जमीनी हकीकत का विश्लेषण करने पर कई चिंताजनक पहलू सामने आते हैं।
1. संपत्ति के अधिकार से वंचना और ‘डायन प्रथा’ का दंश:
संताल समाज पितृसत्तात्मक है। यहाँ महिलाओं को ‘रूढ़िवादी प्रथा’ के तहत पैतृक संपत्ति या जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिलता। उन्हें केवल भरण-पोषण का अधिकार होता है। समाजशास्त्रियों और महिला कार्यकर्ताओं का मानना है कि दुमका और आसपास के ग्रामीण इलाकों में आज भी जारी ‘डायन प्रथा’ का सीधा संबंध इसी संपत्ति के अधिकार से है।
जब कोई संताल महिला विधवा हो जाती है या अकेली रह जाती है, तो उसकी जमीन हड़पने के लिए स्थानीय दबंग, सगे-संबंधी या ओझा मिलकर उसे ‘डायन’ घोषित कर देते हैं। फूलो-झानो की विरासत वाली इस भूमि पर महिलाओं का इस तरह का अमानवीय उत्पीड़न समकालीन झारखंड के माथे पर सबसे बड़ा कलंक है। कानून (जैसे ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’) होने के बावजूद, सामाजिक चेतना और शिक्षा की कमी के कारण यह कुप्रथा जड़ से समाप्त नहीं हो पाई है।
2. पलायन और मानव तस्करी का दंश:
दुमका, जामताड़ा और पाकुड़ जैसे जिलों से हर साल हजारों युवा महिलाएं और किशोरियां काम की तलाश में दिल्ली, मुंबई, पश्चिम बंगाल और ईंट-भट्टों की ओर पलायन करती हैं। रोजगार के अवसरों के अभाव और कृषि के मानसून पर आधारित होने के कारण यह पलायन मजबूरी बन चुका है।
इस पलायन के पीछे मानव तस्करी का एक बड़ा रैकेट सक्रिय है। भोली-भाली आदिवासी और दलित लड़कियों को अच्छे वेतन का लालच देकर महानगरों में ले जाया जाता है, जहाँ उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होता है। जो समाज कभी अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए तीर तान देता था, आज वही समाज अपनी बेटियों को असुरक्षित महानगरों में भेजने को विवश है। यह हूल के सपनों के ठीक विपरीत है।
3. स्वास्थ्य, पोषण और मातृ मृत्यु दर की गंभीर स्थिति:
महिला दृष्टिकोण से स्वास्थ्य एक बुनियादी अधिकार है। संताल परगना के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों (जैसे दुमका के गोपीकांदर, शिकारीपाड़ा, काठीकुंड ब्लॉक) में आज भी आदिम जनजाति (जैसे पहाड़िया) और संताल महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) और कुपोषण की दर अत्यधिक उच्च है। संस्थागत प्रसव के दावों के बावजूद, बुनियादी स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों और एम्बुलेंस की कमी के कारण आज भी कई प्रसूताएं रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। शिक्षा का अभाव और अंधविश्वास इस समस्या को और जटिल बना देते हैं।
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संताल परगना और दुमका जिले के विशेष संदर्भ में चुनौतियाँ:
दुमका को झारखंड की उपराजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह क्षेत्र सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय और बाबा बासुकीनाथ धाम जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्रों के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद, इस जिले और पूरे प्रमंडल में कई ऐसी समकालीन चुनौतियाँ हैं जो सीधे तौर पर हूल की विरासत को चुनौती देती हैं।
1. पहचान और जनसांख्यिकीय बदलाव:
संताल परगना में पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय संरचना में तेजी से बदलाव आया है। बांग्लादेशी घुसपैठ और बाहरी आबादी के अवैध आगमन के कारण स्थानीय आदिवासियों की आबादी का प्रतिशत धीरे-धीरे कम हुआ है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह बदलाव स्थानीय संस्कृति, भाषा (संताली) और परंपराओं के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। इसके कारण जल-जंगल-जमीन के संसाधनों पर दबाव बढ़ा है और स्थानीय आदिवासियों तथा नए बसे समूहों के बीच सामाजिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
2. पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था का कमजोर होना:
संताल समाज की अपनी एक अनूठी और लोकतांत्रिक स्वशासन व्यवस्था है, जिसे ‘मांझी परगनाइत व्यवस्था’ कहा जाता है। इसमें मांझी हड़ाम, जोग मांझी, गोड़ैत और परगनाइत जैसे पद होते हैं, जो गाँव के विवादों को आपसी सहमति से सुलझाते हैं।
समकालीन दौर में, आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था और अदालती प्रक्रियाओं के समानांतर आने से यह पारंपरिक व्यवस्था कमजोर हुई है। हालांकि कानूनन दोनों में समन्वय होना चाहिए था, लेकिन व्यवहार में पारंपरिक प्रधानों की शक्ति और सम्मान में कमी आई है। दुमका के कई गाँवों में अब पारंपरिक निर्णयों को चुनौती दी जा रही है, जिससे समाज का आंतरिक अनुशासन भंग हो रहा है।
3. युवाओं में बढ़ता भटकाव और साइबर अपराध:
संताल परगना का एक हिस्सा (विशेषकर जामताड़ा और देवघर-दुमका के सीमावर्ती क्षेत्र) पिछले कुछ वर्षों में ‘साइबर अपराध’ के केंद्र के रूप में बदनाम हुआ है। रोजगारपरक शिक्षा और नैतिक मूल्यों के अभाव में स्थानीय युवा इस दलदल में फंस रहे हैं। जो युवा शक्ति हूल के समय समाज के निर्माण और रक्षा में लगती थी, वह आज तकनीकी भटकाव और अपराध की ओर अग्रसर है। यह सामाजिक पतन का एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है।
हूल की भावना को जीवंत रखने का संकल्प
संताल हूल कोई बीता हुआ कल नहीं, बल्कि वर्तमान को जीने और भविष्य को संवारने का एक जीवंत दर्शन है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि अन्याय, शोषण और असमानता के खिलाफ चुप रहना समाज के पतन का कारण बनता है।
आज के झारखंड और दुमका को किसी नए हिंसक आंदोलन की जरूरत नहीं है, बल्कि ‘वैचारिक और संरचनात्मक हूल’ की जरूरत है। यह हूल अशिक्षा के खिलाफ, कुपोषण के खिलाफ, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ, और अपनी अस्मिता को बेचने वाली ताकतों के खिलाफ होना चाहिए।
जब तक संताल परगना की आखिरी कतार में बैठी महिला सुरक्षित, शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो जाती, तब तक सिदो-कान्हू और फूलो-झानो का ‘अबुआ दिशोम, अबुआ राज’ (हमारा देश, हमारा राज) का सपना अधूरा रहेगा।


