अशोक कुमार
न्यायालय के बार बार आदेश के आलोक में आखिर झारखंड सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति कर एक सराहनीय और संवैधानिक काम किया है। पिछले पांच साल से यह संवैधिानक पद रिक्त पड़ा था। भ्रष्टाचार एवं लोकसेवकों से संबंधित शिकायतें लंंबित पड़ी थी। नवनियुक्त लोकायुक्त न्यायमूर्ति श्री अमिताभ कुमार गुप्ता ने पदभार ग्रहण करने के बाद कहा हेै कि लंबित मामलों का वे तेजी से निबटारा करेंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि वे अपने दायित्व का भलीभांति निर्वहन करेंगे। उनका पिछला कार्यकाल भी एक ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ जज के रूप में रहा है। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्ठाचार पर नियंत्रण के लिए केंद्र में लोकपाल एवं राज्यों में लोकायुक्त विधेयक 2016 में लाया था। झारखंड में राज्य के गठन के बाद लोकायुक्त अधिनियम 2001 के तहत पहली बार 2005 में लोकायुक्त की नियुक्ति की गयी थी। पहले लोकायुक्त हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज श्री लक्ष्मण उरांव बने थे। उनके बाद कई लोकायुक्तों की नियुक्तियां हुई लेकिन किसी भी लोकायुक्त ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी भ्रष्ट अधिकारी व मंत्री के खिलाफ आए शिकायत पर कोई ठोस सिफारिश की हो, ऐसा मामला सार्वजकि नहीं हुआ है।
यह सही है कि लोकायुक्त की कार्रवाई गोपनीय होती है। लोकायुक्त कानून की यह विडंबना है कि उसमें लोकायुक्त को कोई दंडात्मक व प्रशासनिक कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है। जांचोपरांत मामला सही पाए जाने पर भी वे कार्रवाई की मात्र सिफारिश ही राज्यपाल से कर सकते हैं। दूसरी विडंबना यह है कि लोकायुक्त के पास भ्रष्टाचार से संबंधित कार्रवाई के लिए कोई जांच एजेंसी नहीं है। वे दंतहीन प्राणी की तरह हैं। वे किसी भी मामले की जांच के लिए राज्य सरकार की जांच एजेंसियों पर ही निर्भर हैं। भ्रष्ट व्यक्ति इन जांच एजेंसियों को आसानी से प्रभावित कर रिपोर्ट अपने पक्ष में दिलवा सकता है। ऐसी स्थिति में लोकायुक्त जैसी महत्वपूर्ण संस्था की जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकता है। लोकायुक्त को स्वतंत्र जांच एजेंसी उपलब्ध कराने के लिए पूर्व लोकायुक्त लक्ष्मण उरांव, अमरेश्वर सहाय आदि ने राज्यपाल को कई पत्र लिखे लेकिन राज्य सरकार पूर्व लोकायुक्तों की जायज मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। सच्चाई यह है कि कोई भी पार्टी की सरकार हो , उसके मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि लोकायुक्त एक मजबूत संस्था बने और भ्रष्टाचार के मामले में कड़ी कार्रवाई कर सके।
चूंकि लोकायुक्त के जांच दायरे में मंत्रियों के साथ साथ मुख्यमंत्री भी आते हैं। पूर्व लोकायुक्त जस्टिस लक्ष्मण उरांव ने 2005 और 2006 में मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में कई बार कहा था की राज्य सरकार की इच्छा शक्ति भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने की नहीं है। यदि सरकार की इच्छा शक्ति होती तो दूसरे राज्यों की तरह झारखंड के लोकायुक्त को भी स्वतंत्र जांच एजेंसी मुहैया कराती। कई राज्यों जैसे कर्नाटक, मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र आदि में लोकायुक्त को वहां की सरकारों द्वारा स्वतंत्र जांच एजेंसी उपलब्ध करायी गई है। कर्नाटक के लोकायुक्त ने अपनी एजेंसी से कई भ्रष्ट अफसरों के यहां छापेमारी कर अवैध संपत्तियां ,कागजात आदि जब्ती की कार्रवाई कर एक मिशाल पेश कर चुके हंै। जरूरत है कि झारखंड के लोकायुक्त को भी स्वतंत्र जांच एजेंसी उपलब्घ करायी जाए तथा झारखंड सरकार लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन कर लोकायुक्त को मजबूत बनाए ताकि राज्य में भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके। कहीं ऐसा न हो की लोकायुक्त भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई करने की दिशा में ठोस कदम न उठाकर एक शक्तिहीन संवैधानिक पद मात्र न रह जाए।


