नोएडा । दिल्ली से सटे नोएडा की हाई-राइज सोसायटियों में मंगलवार को घरेलू कामगारों (मेड्स) का आक्रोश सड़कों पर उतर आया। अपनी मांगों को लेकर किए गए इस प्रदर्शन ने न केवल स्थानीय प्रशासन और निवासियों का ध्यान खींचा, बल्कि सोशल मीडिया पर एक नई वैश्विक बहस को भी जन्म दे दिया है। चर्चा का मुख्य केंद्र यह है कि क्या भारत में भी घरेलू कामगारों को पश्चिमी देशों की तर्ज पर वेतन, सुविधाएं और पेशेवर सम्मान मिलना चाहिए।
अमेरिका और यूरोप में घरेलू कामगारों की स्थिति भारत के मुकाबले काफी अलग और पूरी तरह पेशेवर होती है। अमेरिका में लेबर कॉस्ट इतनी अधिक है कि वहां मेड रखना एक लग्जरी माना जाता है। वहां एक पेशेवर हाउसकीपर की औसत सैलरी 25 से 50 डॉलर प्रति घंटा तक होती है। वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहरों में अनुभवी मेड सालाना 60 से 85 लाख रुपये तक कमाती हैं। इतना ही नहीं, वहां सार्वजनिक परिवहन की सीमाओं के कारण अधिकांश मेड्स अपनी निजी कारों से काम पर आती हैं, जिसके लिए कई बार मालिक उन्हें कार अलाउंस भी देते हैं।
यूरोप में स्थिति और भी अधिक व्यवस्थित है। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में घरेलू कामगारों को नौकर नहीं बल्कि वर्कर का दर्जा प्राप्त है, जिनके काम के घंटे कानूनन तय हैं। वहां उन्हें साल में 20 से 30 दिनों की पेड लीव (सवेतन अवकाश) और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं मिलती हैं। सबसे महत्वपूर्ण राइट टू डिस्कनेक्ट का अधिकार है, जिसके तहत काम के घंटों के बाद मालिक उन्हें फोन नहीं कर सकता। वहां डिग्निटी ऑफ लेबर का भाव इतना प्रबल है कि मेड का मालिक के साथ एक ही टेबल पर खाना खाना या फॉर्मल कपड़ों में काम पर आना बेहद सामान्य बात है।
हालांकि, इस तुलना का एक दूसरा पहलू महंगाई और सामाजिक सुरक्षा भी है। विशेषज्ञों का तर्क है कि भले ही विदेशों में मेड्स लाखों में कमाती हैं, लेकिन वहां जीवन निर्वाह का खर्च भी अत्यधिक है। अमेरिका में एक साधारण घर का किराया ही डेढ़ से दो लाख रुपये तक होता है, और उन्हें अपना बीमा व टैक्स खुद वहन करना पड़ता है। इसके विपरीत, भारत में अक्सर मालिक अपने घरेलू सहायकों के भोजन, पुराने कपड़े या छोटी-मोटी बीमारियों की दवाओं का खर्च अनौपचारिक रूप से कवर कर लेते हैं। नोएडा की सड़कों से शुरू हुआ यह विवाद अब भारतीय श्रम ढांचे में बड़े बदलाव और कामगारों के सम्मानजनक जीवन की मांग की ओर इशारा कर रहा है।


