नई दिल्ली । देश की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर चिंताजनक खबर सामने आई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अपने नवीनतम पूर्वानुमान में कहा है कि इस साल मॉनसून के कुल मिलाकर सामान्य से कमजोर रहने की संभावना है। साल 2023 के बाद यह पहला मौका है जब मौसम विभाग ने कम बारिश का अनुमान जताया है। मौसम विभाग के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के दौरान बारिश दीर्घकालिक औसत (एलपीए) की लगभग 92 फीसदी रहने के आसार हैं। विभाग ने इस पूर्वानुमान में 5 फीसदी की मॉडल त्रुटि की गुंजाइश भी रखी है।
इस कम बारिश का मुख्य कारण प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो की स्थितियों को माना जा रहा है, जो अक्सर भारतीय मॉनसून को प्रभावित करती हैं। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो चार महीने के मॉनसून सत्र के लिए एलपीए 87 सेंटीमीटर निर्धारित है। यदि पूर्वानुमान सटीक बैठता है, तो देश भर में औसत वर्षा मात्र 80.04 सेंटीमीटर के आसपास सिमट सकती है। मौसम विभाग के मानदंडों के अनुसार, एलपीए के 90 से 95 फीसदी के बीच की बारिश को सामान्य से कम श्रेणी में रखा जाता है। विभाग ने संभावना जताई है कि देश के अधिकांश हिस्सों में बारिश की कमी खलेगी, हालांकि पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थिति थोड़ी बेहतर रह सकती है। विश्लेषण के मुताबिक, मॉनसून के कमजोर रहने की 35 फीसदी और सामान्य से कम रहने की 31 फीसदी संभावना है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि कम बारिश का मतलब हमेशा खराब फसल नहीं होता। यदि वर्षा का समय और वितरण सही रहा, तो खरीफ उत्पादन पर असर कम हो सकता है। फिर भी, गैर- सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाने वाली दलहन और तिलहन की फसलों के लिए जोखिम बढ़ गया है। यदि इन फसलों का उत्पादन घटता है, तो आयात बिल बढ़ने और खाद्य मुद्रास्फीति में उछाल आने का खतरा पैदा हो सकता है, जिससे देश की आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है। वर्तमान में भारत का 55 फीसदी कृषि क्षेत्र सिंचित है, जो सूखे जैसी स्थितियों से लड़ने में मदद करता है। मौसम विभाग मई के अंत में अपना अपडेटेड पूर्वानुमान जारी करेगा, जिसमें मॉनसून की सटीक तारीख की जानकारी दी जाएगी।
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