अशोक कुमार
प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने कहा है की जिन्हें राजनीतिक और समाजिक जीवन में रहना है, उन्हें परिवार नहीं बसाना चाहिए । उन्होंने इसका उदाहरण भी पेश किया। उन्होंने शादी नहीं की। देश के समाजवादी नेता एक लंबे समय से कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की आलोचना करते आ रहे हैं। क्योकि कांग्रेस नेताओं ने भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढ़ाया है। वे उदाहरण देते हैं की जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू जब कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो उन्होंने अपने पुत्र जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए तीन बार महात्मा गांधी को पत्र लिखा था। अंतत: गांधी जी ने उनकी बात मानते हुए 1929 में जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया था। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को राजनीति में लाकर सत्ता की चाबी सौंपी इंदिरा गंाधी अपने पुत्र राजीव गांधी को उनकी इच्छा के विपरीत राजनीति में लाए। राजीव गांधी ने अपनी पत्नी सोनिया गांधी को राजनीति में लाने के लिए प्रेरित किया। सोनिया गांधी ने अपने पुत्र राहुल गांधी और पुत्री प्रियंका गांधी को राजनीति में लायी। अपवाद में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री व कांग्रेसी नेता श्री कृष्ण सिंह को लिया जा सकता है जिन्होंने अपने जीते जी अपने दोनों पुत्रों को राजनीति में नहीं लाए। उनके देहांत के बाद ही उनके पुत्र शिव शंकर सिंह और बंदी शंकर सिंह राजनीति में आ पाए।
समाजवादी नेता डॉ लोहिया से लेकर जॉर्ज फर्ऩान्डिस, मुलायम सिंह यादव, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश कुमार, कपिल देव सिंह जैसे समाजवदी नेता कांग्रेस के वंशवाद की राजनीति का हमेशा से आलोचना करते रहे हैं। इन नेताओं ने अपने राजनीतिक कार्यकाल में अपने परिवार के लोगों को राजनीति मेें आने नहीं दिया। कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद ही उनके बड़े पुत्र रामनाथ ठाकुर राजनीति में आ सके। नीतीश् कुमार ने भी अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अपने परिवार के लोगों को राजनीति में आने नहीं दिया। जनसंघ, भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने भी राजनीति में चल रही वंशवाद की परंपरा का विरोध करते रहे हैं।
लेकिन समाजवादी नेता समय और परिस्थतियों के अनुसार डॉ लोहिया के सिद्धांतों को तिलांजलि देते हुए अपने-अपने पुत्र-पुत्रियों को न केवल राजनीति में लाते रहे बल्की उन्हें उनकी योग्यता के विपरीत बड़े पदों पर बैठाते चले गए। इनमें समाजवदी नेता लालू यादव का नाम सबसे ऊपर है। पशुपालन घोटाले में जब वह जेल जाने लगे तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बैठा दिया। उन्होंने अपने बेटे-बेटियों को एमएलए-एमपी भी बना दिया। लालू ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर पार्टी की कमान अपने पुत्र तेजस्वी यादव को सौंप दिया। इसी तरह स्वर्गीय रामविलास पासवान ने भी अपने पुत्र और भाईयों को एमपी और एमएलए बनाया।
यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और लोहिया के पक्के सिपाही माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश सिंह यादव को पहले सपा का अध्यक्ष और फिर मुख्यमंत्री बना दिया। नीतीश कुमार भी अंतत: इन्ही नेताओं के श्रेणी में आ गए। जब शुक्रवार को जदयू विधानमंडल व संसद सदस्यों की पटना में बैठक हुई तो जदयू विधायकों ने उनके पुत्र निशांत कुमार को जदयू की सदस्यता का प्रस्ताव पास किया तो नीतीश खामोश रहकर आखिर वंशवाद की राजनीति पर मुहर लगा दी। ज्ञात हो की नीतीश कई मौके पर लालू यादव को उनके परिवारवाद केंद्रीत राजनीति तीखी टिपणियां कर चुके हैं। अब क्या नीतीश कुमार सीना तानकर अपने नेता लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों की दुहायी दे सकेंगे। समाजवादी नेता डॉ लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, कपिल देव सिंह, जॉर्ज फर्ऩान्डिस ने अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में नहीं लाकर एक मिशाल पेश की।


