झारखण्ड के माननीय को गुरुजी का आदर्श पेश करना होगा
राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
दिशोम गुरु शिबू सोरेन अब झारखंड के लोगों के लिए पुरखा हो गए। पुरखा माने देवता पितर की श्रेणी में आ गए। दिवंगत होने के बाद पृथ्वीलोक से गुरुजी का स्वर्गारोहण हो गया। अब पृथ्वीलोक पर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और उपलब्धियों की चर्चा हो रही है। विधानसभा में विस्तारित मानसून सत्र में माननीयों ने गुरुजी को सम्मानित करने के अलग अलग प्रस्ताव दिए। शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग उठ रही है। झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने स्कूली बच्चों को स्कूलों में पाठ्य पुस्तक के माध्यम से उनकी जीवनी पढ़ाने का सैद्धांतिक निर्णय लिया है। शिक्षा विभाग पाठ्यक्रम का करिकुलम बना रहा है। माननीयों ने उनके निधन के बाद उन्हें इतिहास पुरुष, झारखंड आंदोलनकारी, समाज सुधारक, नशाखोरी के खिलाफ आंदोलनकारी, बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करनेवाला, और न जाने कितनी तरह की संज्ञा से संबोधित किया है। कुछ माननीयों ने उन्हें भारत रत्न देने की भी सिफारिश करने की बात कही है। गुरुजी राजनीतिक क्षेत्र में काम करनेवाले न होते तो शायद आज उनके लिए इस तरह सम्मान की बातें न होती। झारखंड में अलग राज्य की लड़ाई लडऩेवाले कई नामचीन लोग हुए, लेकिन गुरुजी में क्या अलग था, जो उन्हें भीड़ से अलग करता है। इस पर समीक्षा होनी चाहिए। जब मैं रांची से प्रकाशित होनेवाले एक राष्ट्रीय अखबार के लिए शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी का इंटरव्यू लेने उनके बोकारो स्थित घर पर गया था, उस दौरान गुरुजी के बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक मिली थी। बात लगभग 18-19 साल पुरानी है। तब गुरुजी के व्यक्तित्व के उन पहलुओं से रूबरू होने का अवसर मिला था, जिसके कारण शिबू सोरेन सचमुच गुरुजी कहलाते थे। राजनेता से इतर हटकर शिबू सोरेन विशुद्ध गुरुजी की भूमिका में उन्होंने समाज को नई दिशा दी। जब दिन के 11 बजे हम दो पत्रकार उनके घर पर पहुंचे तब गुरुजी फरियादियों के बीच बैठे हुए थे। दूर दराज क्षेत्र से आए ग्रामीण और शहरी अपनी अपनी समस्याएं लेकर उनके सामने उपस्थित थे। मेरे साथ वरिष्ठ पत्रकार शफीक अंसारी थे, जो बाद में गुरुजी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके प्रेस सलाहकार बने। गुरुजी हमें घर के अंदर ले गए। उन्होंने दिखाया कि घर में उनकी रसोई बिल्कुल अलग है, जबकि परिवार के अन्य सभी सदस्यों के लिए अलग रसोई है। गुरुजी पूर्णरूप से निरामिष भोजी थे। मांस, मछली अंडा, मुर्गी कुछ नहीं खाते थे। शराब और मदिरा से कोसों दूर रहते थे। वह लोगों को शराब, नशा से न सिर्फ दूर रहने की नसीहत देते थे, बल्कि खुद उन्होंने अपने जीवन में यह सब उतार कर दिखा दिया। यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। आज झारखंड के माननीयों को यही आदर्श पेश करना होगा। नसीहत देना एक बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात। गुरुजी ने अशिक्षा के खिलाफ आंदोलन चलाया था। लोगों को पढऩे लिखने और आगे बढऩे की नसीहत दी। ग्रामीणों खासकर आदिवासी समाज से कहते थे, पढ़ो लिखो आगे बढ़ो। धनबाद जिले के टुंडी पोखरिया में गुरुजी का आश्रम इसी बात का जीता जागता प्रमाण था कि गुरुजी की यहां रात्रि पाठशाला चलती थी। आज झारखंड में कई ऐसे परिवार हैं जो शोषकों और साहूकारों के शिकार हो रहे हैं। शोषकों और साहूकारों का स्वरूप बदल गया है। सरकारी तंत्र से जुड़े लोग शोषकों के नए अवतार हो चुके हैं। बैंकिंग और नन बैंकिंग संस्थान साहूकारों की भूमिका में पहुंच चुके हैं। इनके शिकार झारखंड के लाखों परिवार इसका दंश झेल रहे हैं। गुरुजी के सच्चे अनुयायियों को सच्चे मन से इस दिशा में काम करना होगा। शिबू सोरेन ने राजनीतिक क्षेत्र में जितना काम किया, उससे कम नहीं सामाजिक क्षेत्र में काम किया। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। गुरुजी तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। लंबे समय तक उन्होंने शासन नहीं किया, लेकिन एक समाज सुधारक के रूप में गुरुजी ने जिंदगी भर काम किया। इसलिए गुरुजी भारत रत्न बनाए जाएं या नहीं, वह झारखंड के माटीपुत्र और झारखंड रत्न तो रहेंगे ही। झारखंड की राजनीति में राजनीतिक दलों को उनकी नीति, सिद्धांत और सोचने की प्रक्रिया भी अपनानी होगी। केवल गुरुजी को भारत रत्न दिलाने की सिफारिश करने मात्र से झारखंड की राजनीतिक व्यवस्था नहीं सुधरेगी। हर नेता और दल को गुरुजी के बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेना होगा। यही उनके लिए असली भारत रत्न की उपाधि होगी।


