नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच फिर व्यापार और प्रतिबंधों को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में 2026 के लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कानून अमेरिकी प्रशासन को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की ताकत देता है, हालांकि भारत पर ऐसा शुल्क अपने आप लागू नहीं होता। इसके बाद 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भारत-अमेरिका संबंधों का दौर फिर से चर्चा में आ गया है, जब वाशिंगटन ने नई दिल्ली पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे और भारत ने उनका मजबूती से सामना किया था।
11 मई 1998 को भारत ने राजस्थान के पोखरण में ऑपरेशन शक्ति के तहत सफल परमाणु परीक्षण किए। इसके मात्र दो दिन बाद, 13 मई को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ग्लेन संशोधन के तहत भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों में व्यापक विदेशी सहायता पर रोक, कुछ रक्षा निर्यातों पर प्रतिबंध और अन्य आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग पर रोक शामिल थी। अमेरिकी नीति का प्राथमिक उद्देश्य भारत पर परमाणु अप्रसार से जुड़े कदम उठाने के लिए दबाव बनाना था। उस समय अमेरिकी प्रशासन ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि इन प्रतिबंधों से दोनों देशों को आर्थिक और राजनीतिक लागत चुकानी पड़ सकती है।
इन प्रतिबंधों का भारत पर निश्चित रूप से असर पड़ा, लेकिन नई दिल्ली ने अपनी परमाणु नीति में कोई बदलाव नहीं किया। भारत ने एक ओर अमेरिका के साथ संवाद का रास्ता खुला रखा, दूसरी ओर अपने कारोबारी संबंधों को विभिन्न देशों के साथ मजबूती से बनाए रखा। भारत की दृढ़ता और कूटनीतिक लचीलेपन का परिणाम यह हुआ कि प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हुई। 1999 में अमेरिकी कांग्रेस ने भारत और पाकिस्तान के लिए प्रतिबंधों में कुछ राहत की गुंजाइश बढ़ाई, और 2000 में एक रक्षा विनियोग कानून के जरिए राष्ट्रपति को इन प्रतिबंधों को माफ करने का व्यापक अधिकार मिल गया।
इसी बीच भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक संवाद लगातार आगे बढ़ता रहा। मार्च 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन की भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत बनी। इसके बाद जॉर्ज डब्ल्यू. बुश प्रशासन ने भी भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाए। आखिरकार, 22 सितंबर 2001 को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद लगाए गए ग्लेन संशोधन प्रतिबंधों को भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए माफ कर दिया। अमेरिकी सरकारी दस्तावेज में इसे दोनों देशों के साथ अप्रसार संबंधी मुद्दों पर कम दबाव वाले माहौल में जुड़ने की नीति के रूप में दर्ज किया गया है।
इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे रणनीतिक नजदीकी बढ़ी और 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने इन संबंधों को एक नया आयाम दिया। 1998 से 2001 तक का यह अनुभव यह दिखाता है कि प्रतिबंधों के दौर में भी भारत ने अपनी नीतिगत स्थिति बनाए रखने के साथ-साथ अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रखा। आज जब रूस से भारतीय ऊर्जा खरीद को लेकर फिर से दबाव की स्थिति बन रही है, तो 1998 का यह अनुभव हमें सिखाता है कि रणनीतिक धैर्य और निरंतर संवाद हमेशा महत्वपूर्ण होता है, हालाँकि मौजूदा कानून के तहत संभावित टैरिफ की वास्तविक दर और दायरा अमेरिकी प्रशासन के आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।


