नई दिल्ली । आज की तेज रफ्तार जिंदगी में परिवार के अधिकांश सदस्य नौकरी, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। कई परिवारों में बच्चे दूसरे शहरों या विदेशों में रहते हैं। ऐसे में बुजुर्गों के पास समय तो पर्याप्त होता है, लेकिन उसे साझा करने के लिए परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं होता। दिनभर अकेले रहना और बातचीत के अवसर कम होना धीरे-धीरे उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करा सकता है। रिटायरमेंट के बाद यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। नौकरी के दौरान ऑफिस, सहकर्मियों और रोजमर्रा के कामों के कारण सामाजिक संपर्क बना रहता है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद अचानक दिनचर्या बदल जाती है। सुबह से रात तक करने के लिए कम काम बचता है और यदि परिवार के सदस्य भी व्यस्त हों तो बातचीत और मेलजोल के अवसर और घट जाते हैं। इसलिए रिटायरमेंट के बाद सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण दिनचर्या बनाना महत्वपूर्ण है। तकनीक ने दूर रहने वाले परिवारों से संपर्क आसान जरूर किया है, लेकिन सिर्फ फोन या वीडियो कॉल बुजुर्गों की भावनात्मक जरूरत पूरी नहीं कर सकते। उन्हें आमने-सामने बैठकर बातचीत करने, साथ खाना खाने, टहलने और परिवार की गतिविधियों में शामिल होने का एहसास भी चाहिए। घर में बच्चे मौजूद हों, लेकिन लगातार मोबाइल या टीवी में व्यस्त रहें, तब भी बुजुर्ग अकेलापन महसूस कर सकते हैं।
लंबे समय तक सामाजिक अलगाव मूड, चिंता और जीवन के प्रति उत्साह को प्रभावित कर सकता है। कुछ बुजुर्ग खुद को परिवार पर बोझ भी समझने लगते हैं। हालांकि हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है और अकेलापन किसी बीमारी का सीधा कारण नहीं माना जा सकता, फिर भी लगातार सामाजिक अलगाव को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। इस समस्या का समाधान बुजुर्गों को केवल व्यस्त रखने में नहीं, बल्कि उन्हें परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस कराने में है। परिवार के सदस्यों को रोज कुछ समय उनके साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए। उनकी दवाइयों और घरेलू जरूरतों के अलावा उनके अनुभव, पसंद, शौक और भविष्य की योजनाओं के बारे में भी बात करनी चाहिए। घर के फैसलों में उनकी राय लेना भी जरूरी है।
बुजुर्गों को पड़ोसियों, दोस्तों और समान उम्र के लोगों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। सुबह की सैर, योग, बागवानी, संगीत, किताब पढ़ना, सामाजिक गतिविधियों या पुराने शौक को फिर से अपनाना उनकी दिनचर्या को बेहतर बना सकता है। अगर बच्चे अलग रहते हैं तो केवल पैसे भेजना पर्याप्त नहीं है। नियमित बातचीत, मुलाकात और उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। सबसे बढ़कर बुजुर्गों को उनकी उम्र के कारण कमजोर या असहाय मानने के बजाय सम्मान, जिम्मेदारी और निर्णय लेने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। कई बार साथ बैठकर चाय पीना और उनकी बात ध्यान से सुनना ही उनके अकेलेपन को कम करने की सबसे बड़ी शुरुआत बन सकता है। मालूम हो कि शहरों में ऊंची इमारतों में आसपास सैकड़ों लोग रहने के बावजूद कई बुजुर्गों के पास अपनी बात साझा करने वाला कोई करीबी नहीं होता। घर में टीवी, मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव की कमी उन्हें भीतर से अकेला महसूस करा सकती है।


