लखनऊ । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू हो गई है। कांग्रेस ने करीब 200 विधानसभा क्षेत्रों की एक सूची तैयार की है, जहां से वह चुनाव लड़ने की इच्छुक है। हालांकि, पार्टी ने स्पष्ट किया है कि उसका मकसद इतनी ही सीटें मांगना नहीं है, बल्कि गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी हासिल करना है। कांग्रेस की इस मांग के साथ ही उसके पिछले चुनावी रिकॉर्ड पर भी नजर डालना जरूरी हो जाता है, क्योंकि पार्टी पिछले दो विधानसभा चुनावों में दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई है।
कांग्रेस ने अपनी सूची को चार श्रेणियों में बांटा है, जिसका उद्देश्य बातचीत के दौरान प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना और समझौते की गुंजाइश बनाए रखना है। श्रेणी ए की सीटों पर कांग्रेस अपना दावा सबसे सख्त रखना चाहती है, जबकि श्रेणी बी की सीटों पर कुछ बदलावों पर विचार किया जा सकता है। श्रेणी सी और डी में शामिल सीटों पर पार्टी समझौते के लिए अपेक्षाकृत अधिक तैयार है। कांग्रेस नेताओं ने साफ किया है कि सीटों की संख्या से अधिक वे गठबंधन में अपनी राजनीतिक हैसियत और सम्मान को महत्व दे रहे हैं, जिस पर कोई समझौता नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन में पिछले 38 सालों से लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 1985 में 269 सीटें जीतकर सरकार बनाने वाली कांग्रेस 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई। 2017 में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को केवल सात सीटें मिली थीं। यानी, पिछले दो विधानसभा चुनावों में पार्टी दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। 1989 के बाद से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के जरिए सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। यह खराब प्रदर्शन सीट बंटवारे की बातचीत में उसकी मोलभाव की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यह बातचीत कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में हुई आंतरिक बैठकों के बाद शुरू हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसमें सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतकर कुल 43 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस प्रदर्शन ने विपक्षी गठबंधन को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सीटों का बंटवारा दोनों दलों के बीच तालमेल की एक बड़ी परीक्षा साबित होगा। भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए दोनों दलों को एक-दूसरे की चुनावी प्राथमिकताओं के प्रति लचीला रुख अपनाना होगा।
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