नई दिल्ली । गुजरात के अहमदाबाद में हुए कांग्रेस के दो दिवसीय अधिवेशन से पार्टी ने अपनी बदली हुई राजनीतिक दिशा का स्पष्ट संकेत दे दिया था। इसे लेकर कहा जा रहा था कि छह दशकों बाद कांग्रेस ने अब सवर्ण मतदाताओं के बजाय ओबीसी, दलित और मुस्लिम वर्ग पर फोकस करने की रणनीति अपनाई है। अब जबकि पहलगाम में आतंकी हमले से पूरा देश हिला हुआ है तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिलेगा? विपक्षी अभी से कहते देखे जा रहे हैं कि भाजपा इस आपदा में भी सियासी लाभ खोजने में लगी हुई है। ऐसे में अन्य दलों को भी चुनावी रणनीति पर पुन: विचार करना पड़ सकता है।
बहरहाल देखना यह होगा कि क्या बिहार में कांग्रेस की नई रणनीति सफल हो पाती है कि नहीं। वैसे दावा तो यही किया जा रहा है कि यह रणनीति बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के लिए सीधी चुनौती खड़ी करेगी। भले ही आतंकी हमला हुआ है, लेकिन अभी चुनाव होने में समय है और ऐसे में लोगों को अपनी रणनीति के तहत लुभाने का काम किया जा सकेगा।
कांग्रेस ने गुजरात बैठक के बाद तर्क दिया था कि भाजपा ने सवर्णों के साथ स्थायी गठजोड़ बना लिया है, जिससे अब इन वर्गों से अपेक्षाएं रखना फायदेमंद नहीं है। इसलिए पार्टी अब बहुजन समाज, जिसमें ओबीसी, दलित और मुसलमान शामिल हैं को अपने नए जनाधार के रूप में देख रही है। अधिवेशन में कांग्रेस ने ऐलान किया कि सत्ता में आने पर वह जातिगत जनगणना कराएगी और एससी-एसटी वर्ग के लिए आबादी के अनुपात में बजटीय प्रावधान सुनिश्चित करने हेतु केंद्रीय कानून बनाएगी।
इस दावे पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। जिन वर्गों को पार्टी अपने साथ जोड़ना चाहती है, वे पहले से ही आरजेडी, सपा, बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के पाले में हैं। बिहार में यादवों का समर्थन आरजेडी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है, वहीं यूपी में यह वर्ग सपा के साथ खड़ा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए इन वोटरों को अपने पक्ष में कर पाना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
इतिहास बताता है कि कांग्रेस कभी मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण वर्ग की पहली पसंद थी, लेकिन समय के साथ नेतृत्व की उपेक्षा और सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी ने इन वर्गों को इससे दूर होने के लिए मजबूर किया। नतीजे में मुसलमानों और पिछड़े वर्गों ने क्षेत्रीय दलों की ओर रुख कर लिया।
कुल मिलाकर, कांग्रेस की नई नीति आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन पहलगाम आतंकी हमले के बाद यह राह और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। अंतत: क्षेत्रीय दलों से टकराव और सामाजिक समीकरणों को फिर से गढ़ना, कांग्रेस के लिए एक लंबी और रणनीतिक लड़ाई होगी।
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now