नई दिल्ली । हाल ही में मेरठ में पति की हत्या के दो अलग-अलग मामलों में महिलाओं और उनके सहयोगियों को मिली मौत की सजा ने भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। यह उस समय में हुआ है जब एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है कि निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई 90 प्रतिशत से अधिक मौत की सजाएं ऊपरी अदालतों में पलट जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई 1,085 मौत की सजाओं में से केवल 106 को ही ऊपरी अदालतों ने बरकरार रखा। इसका मतलब है कि 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में फैसले पलट गए या बदल दिए गए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 407 के तहत, निचली अदालत से मिली मौत की सजा को मंजूरी के लिए उच्च न्यायालय भेजना अनिवार्य है। 2016 से 2025 के दौरान, उच्च न्यायालयों ने मृत्युदंड के केवल 9.77 प्रतिशत मामलों में सजा बरकरार रखी। इसके बाद दोषी सुप्रीम कोर्ट में अपील, समीक्षा याचिका और क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकता है, साथ ही राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास दया याचिका भी लगा सकता है।
भारत में अब तक कानूनी रूप से फांसी पर चढ़ने वाली एकमात्र महिला रतन बाई जैन हैं, जिन्हें 3 जनवरी 1955 को तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी।
तब से लेकर आज तक किसी अन्य महिला को भारत में फांसी नहीं मिली है। हालांकि, 2025 में निचली अदालतों ने 10 महिलाओं को मौत की सजा सुनाई, और 10 लोगों को बरी किया गया। 31 दिसंबर 2025 तक, देश भर में कुल 574 कैदी मृत्युदंड का इंतजार कर रहे थे, जिसमें 24 महिलाएं शामिल थीं। उत्तर प्रदेश की शबनम का मामला इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिन्हें 2010 में सात परिजनों की हत्या के लिए मौत की सजा मिली थी। उनकी दया याचिकाएं भी खारिज हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें अभी तक फांसी नहीं दी गई है। यह ध्यान देने योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2023 से 2025 के बीच किसी भी मामले में मौत की सजा की पुष्टि नहीं की है।
मेरठ में हाल ही में सामने आए दो मामले, जहां पति की हत्या कर उसे सांप से डसवाने वाली रविता और उनके प्रेमी अमरदीप को 547 दिन बाद फांसी की सजा सुनाई गई, और नीले ड्रम मामले में मुस्कान व उनके प्रेमी साहिल को भी 14 अक्टूबर को मौत की सजा मिली, न्यायिक प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण को दर्शाते हैं। हालांकि, इन सजाओं का ऊपरी अदालतों में क्या होगा, यह देखना बाकी है, जहां मृत्युदंड के फैसलों को अक्सर पलटा जाता है।


