नई दिल्ली । भारत के कई शहरों और क्षेत्रों में जमीन की सतह में तेजी से बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं। कहीं धरती धंस रही है, तो कहीं जमीन के ऊपर उठने के संकेत मिल रहे हैं। सैटेलाइट आधारित निगरानी के आंकड़ों में झारखंड के झरिया से लेकर केरल के कोच्चि तक जमीन में बदलाव सामने आए हैं। कुछ क्षेत्रों में धंसाव की दर सालाना 200 मिलीमीटर तक बताई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, अनियंत्रित खनन, भूजल का अत्यधिक दोहन और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियां इस बदलाव की प्रमुख वजह हो सकती हैं।
झरिया में सबसे ज्यादा धंसाव, पंजाब के शहर भी प्रभावित
ताजा अध्ययन के मुताबिक, झारखंड के झरिया में जमीन धंसने की दर सालाना 100 से 200 मिलीमीटर तक दर्ज की गई है। यहां लंबे समय से हो रहे कोयला खनन को इसका प्रमुख कारण माना जाता है। पंजाब के संगरूर में सालाना 70 मिलीमीटर तक, जबकि लुधियाना में 24.7 मिलीमीटर तक धंसाव सामने आया है। इन इलाकों में भूजल का अत्यधिक दोहन भी जमीन के नीचे जाने की वजहों में शामिल है। उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी इलाकों में सालाना 63.2 मिलीमीटर और देहरादून के आसपास 50 मिलीमीटर तक धंसाव दर्ज किया गया है। वाराणसी में यह दर करीब 30 मिलीमीटर बताई गई है। वहीं, दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में जमीन सालाना 2 से 16 मिलीमीटर तक धंस रही है। ऐसे बदलाव शहरी बुनियादी ढांचे और इमारतों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाते हैं।
दक्षिण भारत में भी दिख रहे असर
दक्षिण भारत के कई शहर भी इस बदलाव से अछूते नहीं हैं। बेंगलुरु के कुछ इलाकों में जमीन धंसने के साथ सतह के ऊपर उठने के संकेत भी मिले हैं। चेन्नई के तटीय क्षेत्रों में सालाना 12 मिलीमीटर तक धंसाव दर्ज किया गया है। कोच्चि में औसत धंसाव की दर 1.85 मिलीमीटर बताई गई, जबकि हवाई अड्डे के आसपास यह आंकड़ा 23.6 मिलीमीटर तक पहुंचने का दावा किया गया है। इसके अलावा गुजरात के अहमदाबाद में 25 मिलीमीटर और असम के डिगबोई तथा डिब्रूगढ़ में सालाना 22 मिलीमीटर तक धंसाव दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों में जमीन के ऊपर उठने के संकेत भी मिले हैं।
सैटेलाइट निगरानी से जोखिम की पहचान संभव
सैटेलाइट रडार तकनीक के जरिए जमीन की सतह में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर नजर रखी जाती है। लगातार धंसाव से सड़कों, मेट्रो, फ्लाईओवर, इमारतों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भूजल का संतुलित उपयोग, खनन गतिविधियों की नियमित निगरानी और नियोजित शहरी विकास से जोखिम कम किया जा सकता है। हालांकि, धंसाव की दर स्थान, समय और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर किसी क्षेत्र में तत्काल खतरे का निष्कर्ष निकालने से पहले विस्तृत भूवैज्ञानिक जांच जरूरी है।
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