नई दिल्ली । प्राचीन काल से ही भारत में अनेक पौधों का उपयोग औषधीय जरूरतों के लिए किया जाता रहा है। देश में पेड़-पौधों का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। औषधीय पौधों में बेल का विशेष स्थान है। संस्कृत में इसे बिल्व और अंग्रेजी में वुड एप्पल कहा जाता है। आयुर्वेद में बेल को लंबे समय से महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के रूप में मान्यता मिली हुई है। इसके फल, पत्तियां और जड़ का विभिन्न पारंपरिक औषधीय उपयोगों में उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से बेल के फल को पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है।
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड, आयुष मंत्रालय ने भी सोशल मीडिया मंच एक्स पर बेल के औषधीय महत्व से संबंधित जानकारी साझा की है। वनस्पति विज्ञान में बेल का नाम एगल मार्मेलोस है और यह रैसेसी परिवार का पौधा है। इसे मुख्य रूप से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी माना जाता है। भारत में यह सूखे जंगलों और मैदानी इलाकों में आसानी से पाया जाता है। बेल की खासियत यह है कि यह अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में पनप सकता है और कम उपजाऊ मिट्टी में भी अच्छी वृद्धि करने की क्षमता रखता है। बेल का पेड़ मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष होता है, जिसकी ऊंचाई करीब 15 मीटर तक हो सकती है।
इसकी पत्तियां त्रिपर्णी होती हैं और उनमें हल्की सुगंध पाई जाती है। इसके फूल हरे-सफेद रंग के और सुगंधित होते हैं। बेल का फल कच्ची अवस्था के साथ-साथ सूखने के बाद भी पारंपरिक उपयोगों में लाया जाता है।राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के अनुसार बेल में एंटी-डायरियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल जैसे औषधीय गुण बताए गए हैं। इसके अलावा इसमें एंटीबायोटिक और ब्रोंकोडायलेटर गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है। बेल का महत्व केवल औषधीय उपयोग तक सीमित नहीं है। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भी इसका विशेष स्थान है।
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