◆संताली और ओलचिकी के शिक्षण के साथ भारतीय संस्कृति के संरक्षण में जुटी हैं माइनो मुर्मू
डॉ.सुमन सिंह
दुमका। शिक्षक होना केवल किसी विषय की जानकारी देना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी पहचान, भाषा और संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी है। अमेरिका में रह रहीं माइनो मुर्मू इसी सोच को अपने कार्यों के जरिए आगे बढ़ा रही हैं। स्वास्थ्य एवं वेलनेस के क्षेत्र में सक्रिय होने के साथ-साथ वे भाषा और सांस्कृतिक शिक्षा को भी अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य मानती हैं।
मूल रूप से ओडिशा के मयूरभंज की रहने वाली माइनो मुर्मू का विवाह जमशेदपुर के एक इंजीनियर से हुआ है। उनके पति देवेंद्र मुर्मू वर्तमान में अमेरिका के न्यू जर्सी में रहते हैं। अमेरिका में रहते हुए भी माइनो ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और संताली विरासत से जुड़ाव को बनाए रखा है और अब नई पीढ़ी को भी भाषा एवं संस्कृति से जोड़ने के प्रयास में सक्रिय हैं।
माइनो पिछले पांच वर्षों से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे प्रवासी बच्चों और भारत के शहरी क्षेत्रों के बच्चों को ऑनलाइन संताली भाषा और ओल चिकी लिपि सिखा रही हैं। उनके लिए यह शिक्षण केवल भाषा सीखने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जोड़ने का प्रयास है।
हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में भी उनका लंबा अनुभव रहा है। वे हिंदी यूएसए से दो दशक से अधिक समय से जुड़ी हैं। न्यू जर्सी के ईस्ट ब्रंसविक स्थित स्थानीय अध्याय की वे 13 वर्षों से अधिक समय से समन्वयक हैं। इसके अलावा उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के हिंदी-उर्दू स्टारटॉक कार्यक्रम से शिक्षण-पद्धति(पेडागोगी) का सर्टिफिकेट प्राप्त किया है।
माइनो की शिक्षण यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती हैं। संताली भाषा और ओलचिकी लिपि को विदेश में रह रहे बच्चों तक पहुंचाना ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब प्रवासी परिवारों की नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और परंपराओं से दूर हो सकती है।
उनका योगदान केवल कक्षा तक सीमित नहीं है। ओल चिकी के शताब्दी समारोह के दौरान दांदबोस, ओडिशा में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जन्मस्थली सहित बेंगलुरु और राउरकेला में भी उन्हें भाषा एवं सांस्कृतिक संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया। वर्ष 2025 में उन्होंने फुलब्राइट कार्यक्रम के तहत भारत में एक माह की शोध यात्रा कर विरासत और स्वदेशी परंपराओं का अध्ययन किया।
एक लेखिका के रूप में भी माइनो बच्चों तक अपनी बात पहुंचा रही हैं। उन्होंने पांच बाल पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें तीन द्विभाषी पुस्तकें हैं। उनकी रचनाओं में बच्चों में जिज्ञासा, संवेदनशीलता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना विकसित करने का प्रयास दिखाई देता है।
माइनो मुर्मू की कहानी इस बात की मिसाल है कि शिक्षण की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। अमेरिका में रहते हुए भी उन्होंने भाषा, संस्कृति और शिक्षा के माध्यम से अपनी जड़ों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का रास्ता चुना है।


