◆महाजनी शोषण के खिलाफ संताल परगना की धरती से उठी वह आवाज, जिसने झारखंड आंदोलन को दी नई दिशा
डॉ. सुमन सिंह
दुमका । 4 अगस्त को दिशोम गुरु शिबू सोरेन की प्रथम पुण्यतिथि है। झारखंड आंदोलन के इतिहास में उनका नाम केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे जननायक के रूप में दर्ज है जिन्होंने आदिवासियों, किसानों और वंचित समाज के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। झारखंड राज्य बनने से बहुत पहले उन्होंने संताल परगना की धरती पर महाजनी शोषण, सूदखोरी और जमीन की लूट के खिलाफ ऐसा जनआंदोलन खड़ा किया, जिसने हजारों लोगों में अधिकारों के प्रति नई चेतना जगाई।
सत्तर के दशक में संताल परगना के ग्रामीण क्षेत्रों में महाजनी प्रथा और आर्थिक शोषण व्यापक था। आदिवासी परिवार कर्ज और सामाजिक अन्याय के चक्र में फंसे हुए थे। इसी दौर में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिबू सोरेन को संताल परगना आने का आग्रह किया। उस समय वे धनबाद के टुंडी स्थित पोखरिया आश्रम से सामाजिक जागरण, शिक्षा और आदिवासी अधिकारों का अभियान चला रहे थे। यहीं से उन्हें सम्मानपूर्वक “गुरुजी” कहा जाने लगा, जो आगे चलकर उनकी स्थायी पहचान बन गया।13 मार्च 1976 का दिन संताल परगना के आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। इसी दिन दुमका के एसपी कॉलेज स्थित आदिवासी कल्याण छात्रावास संख्या-1 में उनकी पहली बड़ी बैठक हुई, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी छात्र और युवा शामिल हुए। बैठक में महाजनी शोषण, जमीन की लूट और आदिवासी अधिकारों पर गंभीर चर्चा हुई। गुरुजी ने युवाओं से संगठित होकर संघर्ष करने का आह्वान किया। यही बैठक आगे चलकर संताल परगना में व्यापक जनजागरण अभियान की आधारशिला बनी। वे केवल नेता नहीं, बल्कि समाज के अपने व्यक्ति के रूप में स्वीकार किए गए। उनकी सभाओं का केंद्र जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दे होते थे। उन्होंने आदिवासियों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया और सामूहिक संघर्ष का रास्ता दिखाया।
संताल परगना में शुरू हुआ यह सामाजिक आंदोलन आगे चलकर झारखंड अलग राज्य आंदोलन का मजबूत आधार बना। शिबू सोरेन ने आदिवासी अस्मिता, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और क्षेत्रीय पहचान को आंदोलन का केंद्र बनाया। इसी कारण वे केवल एक राजनीतिक दल के नेता नहीं, बल्कि पूरे झारखंड आंदोलन के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में शामिल हुए।
उनका सार्वजनिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। आंदोलनों के दौरान उन्हें विरोध, मुकदमों और अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनका विश्वास था कि राजनीति का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय दिलाना होना चाहिए।
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आज भी प्रासंगिक है दिशोम गुरु का संदेश
आज जब झारखंड विकास, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार और आदिवासी अस्मिता जैसे प्रश्नों पर नए सिरे से विचार कर रहा है, तब शिबू सोरेन का जीवन और उनके विचार पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। उन्होंने दिखाया कि स्थायी परिवर्तन केवल जनता के बीच जाकर, उनकी समस्याओं को समझकर और उन्हें संगठित करके ही संभव है।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन की प्रथम पुण्यतिथि उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर भर नहीं है, बल्कि उस संघर्ष, सामाजिक चेतना और जनभागीदारी की विरासत को स्मरण करने का भी समय है जिसने झारखंड की पहचान गढ़ी। संताल परगना की धरती पर बोए गए उनके संघर्ष के बीज आज भी नई पीढ़ी को अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने, अपने अधिकारों के लिए संगठित होने और समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़े रहने की प्रेरणा देते हैं।


