दुमका । झारखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की लगातार हो रही मौतों को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बड़ी तकनीकी सफलता हासिल की है। बेंगलुरु की प्रतिष्ठित क्राइस्ट यूनिवर्सिटी तथा अन्य शैक्षणिक संस्थानों के शोधकर्ताओं ने मिलकर एक उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फ्रेमवर्क तैयार किया है। इस क्रांतिकारी तकनीक को “रेलवे ट्रैक पर हाथियों की जोखिम पहचान के लिए रियल-टाइम एआई विज़न सिस्टम” नाम दिया गया है, जिसे भारत सरकार के कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत पंजीकृत भी कर लिया गया है।
**हादसों से लिया सबक**
झारखंड में रेलवे लाइनें कई स्थानों पर हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों से होकर गुजरती हैं, जिससे आए दिन दर्दनाक हादसे होते रहते हैं। हाल ही में फरवरी में लातेहार जिले के कुटरीटोला में एक मालगाड़ी की टक्कर से हाथी के शावक की मौत हो गई थी, जबकि 2021 में पश्चिमी सिंहभूम में दो हाथियों की जान चली गई थी। इसके अलावा, भारत के इतिहास में हाथी-ट्रेन टक्कर की सबसे भीषण घटनाओं में से एक हाल ही में 20 दिसंबर 2025 को असम के होजाई जिले में दर्ज की गई थी। वहाँ तड़के लगभग 2:17 बजे, सैरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस रेलवे ट्रैक पार कर रहे हाथियों के झुंड से टकरा गई थी, जिसमें सात जंगली एशियाई हाथियों की मौके पर ही मौत हो गई और ट्रेन के पांच कोच पटरी से उतर गए थे। इस हादसे ने वन्यजीव संरक्षण और रेलवे अवसंरचना के बीच के इस टकराव पर देशव्यापी चिंता पैदा कर दी थी।
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**कैसे काम करती है यह आधुनिक एआई तकनीक?**
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी चेतावनी प्रणाली पहले मौजूद होती, तो इन हादसों को टाला जा सकता था। इसी कमी को पूरा करने के लिए शोधकर्ताओं ने इस अत्याधुनिक सिस्टम को विकसित किया है। सेंसर और थर्मल कैमरे: यह प्रणाली रेलवे ट्रैक के आसपास मौजूद नर और मादा हाथियों की रियल-टाइम पहचान करने में सक्षम है। इसके लिए इसमें कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क आधारित कंप्यूटर विज़न, थर्मल इन्फ्रारेड कैमरे, एलआईडीएआर (LiDAR) सेंसर तथा एज-एआई प्रोसेसर का उपयोग किया गया है।
* तत्काल अलर्ट सिस्टम: जैसे ही ट्रैक के आसपास कोई हाथी आएगा, यह सिस्टम लोको पायलट, स्टेशन मास्टर और वन विभाग के अधिकारियों को तुरंत अलर्ट भेजेगा। साथ ही यह सीधे रेलवे सिग्नलिंग प्रणाली से जुड़कर उसे भी सचेत कर देगा।
* स्मार्ट हस्तक्षेप: हाथियों को ट्रैक से हटाने के लिए यह सिस्टम ट्रेन के इंजन की हेडलाइट की तीव्रता को स्वचालित रूप से कम करने और ट्रैक के किनारे ध्वनि-आधारित चेतावनी संकेत सक्रिय करने का भी प्रस्ताव रखता है, जिससे हाथी डरकर सुरक्षित दिशा में चले जाएं।
शोधकर्ता टीम का कहना है कि यदि इस एआई आधारित प्रणाली को हाथियों के संवेदनशील रेलवे कॉरिडोर में लागू किया जाए, तो ट्रेन दुर्घटनाओं में होने वाली हाथियों की मृत्यु को पूरी तरह रोका जा सकता है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच एक बेहतरीन संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
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**इन दिग्गजों ने मिलकर किया कमाल**
इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील सहयोगात्मक शोध कार्य को देश के अग्रणी विशेषज्ञों ने मिलकर अंजाम दिया है। इस टीम में शामिल प्रमुख शोधकर्ता हैं:
* डॉ. श्रीनिवास (विभागाध्यक्ष)
* डॉ. सूरज कुमार (मूल निवासी: दुमका, झारखंड)
* डॉ. दारा विजय लक्ष्मी
* निशा फ्रांसिस
* डॉ. के. फ्रांसिस सुधाकर
* लकावत अनिल कुमार
* मुकेश प्रधान
* शरथ चंद्रा रेड्डी
इस नवाचार के मुख्य आविष्कारक क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से संबद्ध हैं, जिन्होंने अन्य विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए इस अभूतपूर्व तकनीक को देश के सामने रखा है। झारखंड के दुमका निवासी डॉ. सूरज कुमार की इस उपलब्धि से स्थानीय स्तर पर भी हर्ष का माहौल है। अब देखना यह है कि भारतीय रेलवे इस सिस्टम को ट्रैक पर कब तक लागू करता है।


