मालिकाना हक को लेकर कृष्णनकुट्टी और माता अमृतानंदमयी मठ के बीच चल रहा विवाद
नई दिल्ली । आमतौर पर अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर विवादों से जुड़े इंसान लगाते हैं, लेकिन केरल का एक प्रसिद्ध हाथी पिछले कई सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। केरल के सबसे ऊंचे और चर्चित हाथियों में शामिल ‘थेचिकोट्टुकावू रामचंद्रन’, जिसे लोग ‘रामन’ के नाम से जानते हैं, अब एक बार फिर सुर्खियों में है। उसके मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए केरल सरकार को निर्देश दिया है कि हाथी को तत्काल अपनी निगरानी में लेकर किसी उपयुक्त पुनर्वास केंद्र में भेजा जाए।
बता दें यह विवाद हाथी के लंबे समय से देखभाल करने वाले कृष्णनकुट्टी और माता अमृतानंदमयी मठ के बीच चल रहा है। मामला पहले पुलिस और मजिस्ट्रेट कोर्ट तक सीमित था, लेकिन बाद में केरल हाईकोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने हाल ही में अंतरिम आदेश जारी करते हुए कृष्णनकुट्टी को कोर्ट की अवमानना का दोषी माना और उन पर दो हजार रुपए का जुर्माना लगाया।
दरअसल, अगस्त 2025 में कृष्णनकुट्टी ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि रामन को किसी भी व्यावसायिक या धार्मिक कार्यक्रम में शामिल नहीं किया जाएगा। बाद में कोर्ट के सामने ऐसे सबूत पेश किए गए, जिनसे पता चला कि हाथी को फिर भी सार्वजनिक आयोजनों और मंदिर उत्सवों में ले जाया गया। कोर्ट ने इसे आदेश का उल्लंघन मानते हुए कड़ी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि बेजुबान जानवरों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
मामले में माता अमृतानंदमयी मठ का दावा है कि रामन कानूनी रूप से मठ की संपत्ति है और उसे केवल देखरेख के लिए कृष्णनकुट्टी को सौंपा गया था। मठ का आरोप है कि बाद में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हाथी पर अवैध दावा किया गया। दूसरी ओर कृष्णनकुट्टी का कहना है कि वह पिछले एक दशक से ज्यादा समय से हाथी की देखभाल कर रहे हैं और साल 2017 में हुए एक उपहार पत्र के आधार पर उन्हें इसका वैध स्वामित्व हासिल था।
बता दें करीब 11 फीट ऊंचे और करीब 6,000 किलोग्राम वजनी रामन को केरल का सबसे विशाल पालतू हाथी है। हालांकि उसकी लोकप्रियता के साथ उसका विवादास्पद इतिहास भी जुड़ा हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक सालों से जुड़ी कई हिंसक घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें कई लोगों की जान भी गई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती उम्र, कमजोर होती दृष्टि और तनावपूर्ण परिस्थितियों के कारण उसका व्यवहार आक्रामक हो गया है। इस पर मठ का तर्क है कि बिना आवश्यक सरकारी अनुमति के किसी भी प्रकार का स्वामित्व हस्तांतरण वैध नहीं माना जा सकता। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार को दी गई कस्टडी केवल अंतरिम व्यवस्था है। हाथी के अंतिम मालिकाना हक का फैसला मुख्य मुकदमे के निपटारे के बाद ही किया जाएगा। तब तक रामन की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।


