रांची: आज के युवा अपने करियर को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक, प्रयोगधर्मी और समाज के प्रति संवेदनशील हो गए हैं। शिक्षा, उद्यमिता, तकनीक, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी दिखाई दे रही है। युवा अब केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि अपने जुनून और विचारों को उद्यम के रूप में विकसित कर समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी सोच का एक प्रेरक उदाहरण हैं डॉ मनीषा उरांव, जो पारंपरिक आदिवासी ज्ञान को आधुनिक तकनीक से जोड़कर नई संभावनाओं का रास्ता खोल रही हैं।
डॉ मनीषा उरांव एक सामाजिक उद्यमी और दंत चिकित्सक हैं, जिन्होंने अपने स्टार्टअप “द ओपन फील्ड” के माध्यम से झारखंड के आदिवासी समुदायों की पारंपरिक कृषि और वनोपज आधारित आजीविका को सशक्त बनाने की पहल की है। वर्ष 2022 में शुरू हुए इस क्लाइमेट-टेक स्टार्टअप का उद्देश्य जंगलों से मिलने वाले उत्पादों जैसे महुआ, इमली और जामुन को उचित मूल्य दिलाना और स्थानीय लोगों को बाजार से जोड़ना है।
डॉ मनीषा बताती हैं कि डॉक्टर बनने के बाद उन्होंने समाज की जमीनी सच्चाई को करीब से देखा। उनके अनुसार, बीमारियों का इलाज दवा से हो सकता है, लेकिन आजीविका की असमानता और संसाधनों की कमी का समाधान व्यवस्था में बदलाव से ही संभव है। इसी सोच ने उन्हें अपने समुदाय के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित किया।
द ओपन फील्ड के माध्यम से उन्होंने कृषि पर्यटन (एग्री-टूरिज्म) की एक अनोखी पहल भी शुरू की है। इस पहल के तहत लोग खेतों और जंगलों से जुड़े अनुभवों को करीब से जान पाते हैं जैसे महुआ संग्रह की प्रक्रिया, झारखंडी पारंपरिक भोजन की विधि, लोकगीत और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की संस्कृति। इससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर भी बन रहे हैं और उनकी सांस्कृतिक पहचान भी संरक्षित हो रही है।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर डॉ. मनीषा का मानना है कि पारंपरिक और ऑर्गेनिक खेती ही जलवायु संकट का स्थायी समाधान है। उनके अनुसार, हमारे पूर्वजों की खेती प्रकृति के साथ तालमेल में थी। यदि हम मिट्टी, जल और जैव विविधता को बचाना चाहते हैं, तो हमें उसी संतुलित खेती की ओर लौटना होगा।
डॉ मनीषा युवाओं को भी खेती को नए नजरिए से देखने की सलाह देती हैं। उनका कहना है कि आज का युवा टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और मार्केटिंग की समझ के साथ खेती को स्टार्टअप की तरह विकसित कर सकता है। स्मार्ट एग्रीकल्चर, सोलर ड्रायर, ब्लॉकचेन ट्रैसेबिलिटी और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर ब्रांडिंग जैसे मॉडल इस क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रहे हैं।
डॉ मनीषा उरांव ने 2013 में एसआरएम यूनिवर्सिटी से डेंटल सर्जरी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और टिकाऊ उद्यमिता के क्षेत्र में काम शुरू किया। रांची में परोक्ष डेंटल केयर क्लिनिक और परोक्ष फाउंडेशन के माध्यम से वे झारखंड, लद्दाख और असम के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए काम कर रही हैं।
इसके साथ ही उन्होंने द ओपन फील्ड फार्म और कैंपट्राइब इको-कैंपिंग की सह-स्थापना की है, जो कृषि पर्यटन और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के साथ आदिवासी आजीविका सशक्तिकरण के लिए काम कर रहे हैं। जनजातीय व्यंजनों के संरक्षण और फार्म-टू-टेबल कॉन्सेप्ट को बढ़ावा देने के लिए उनके प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल चुकी है।


